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पापियों से नहीं पाखंडियों से हुई गंगा मैली

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आयेदिन कई सामाजिक संगठनों से जुड़े लोग और कई हिन्दू धर्माधिकारी यह आरोप लगाते रहे हैं कि अनेक उद्योग धंधों के अपशिष्ट जल के कारण गंगा और यमुना जैसी नदियों का जल प्रदूषित होता जा रहा है। उनका यह आरोप बिल्कुल ठीक है। हमारी इन दोनों नदियों का जहां धार्मिक महत्व है वहीं ये हमारे लिए जीवन दायिनी भी है। लौकिक और पारलौकिक महत्व से जुड़ी इन दोनों नदियों की दुर्दशा वास्तव में हमारे अस्तित्व को बड़ी चुनौती है। हम सभी को इन के शुद्धीकरण का प्रयास करना होगा। केवल उघोगों के खिलाफ बोलने से काम नहीं चलेगा।

जहां औद्योगीकरण से इन नदियों का जल प्रदूषित होने की बात है तो उसके लिए इन नदियों के निकटवर्ती कई उद्योग धंधों को बंद किया गया है और कुछ के खिलाफ कार्रवाई भी हो रही है तथा अनेक इकाईयों ने कचरे और अपशिष्ट जल को इन नदियों में न जाने देने के प्रबंध किये हैं। फिर भी प्रदूषित जल और गंदगी का एक बड़ा भाग नदियों में जा रहा है। दिल्ली और आगरा की तमाम गंदगी आज भी यमुना में पहुंच रही है जिससे उसका जल बेहद जहरीला हो चुका है। यमुनोत्री से दिल्ली तक यह जल ठीक है।

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प्रत्येक पूर्णिमा और अमावस्या को गंगातट पर अनेकों स्थानों पर देश भर में स्नानार्थियों की भारी भीड़ लगती है। यहां ब्रजघाट और तिगरी में ही लाखों लोग स्नान करने आते हैं। यह भारी हुजूम गंगा नदी की पूजा के बहाने उसमें भारी गंदगी प्रवाहित कर चला जाता है। इसके अलावा कार्तिक पूर्णिमा के मौके पर तो प्रति वर्ष दस रोज तक यहां लोग अस्थायी पड़ाव डालकर पवित्र नदी के विस्तृत क्षेत्र को मल-मूत्र तक से अपवित्र कर डालते हैं। लगभग सभी त्योहारों पर गंगा स्नान करने वालों यानि गंगा को मैली करने वालों का तांता लगा रहता है। पूजा के दौरान फल, फूल, दीपक, जली सामग्री और न जाने क्या-क्या गंगा में छोड़कर उसके जल को प्रदूषित करने का प्रयास किया जाता है।

प्रतिदिन शवों का दाह संस्कार करते समय भी गंगा और यमुना दोनों नदियों में न जाने कितना प्रदूषण फैलता है। गंगा को प्रदूषण मुक्त करने के नाम पर सरकार ने अरबों रुपये स्वाह कर दिये। यदि उनसे विद्युत शवदाह ग्रह बना दिये जाते तो प्रदूषण में काफी गिरावट हो गयी होती।

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कई कथित गंगा भक्त सन्यासी, साध्वी, स्वामी और धार्मिक पुरोधा गंगा और यमुना को शुद्ध करने को समय-समय पर अखबारी बयान देकर स्वयं को बहुत बड़े गंगा भक्त सिद्ध करने का प्रयास करते हैं। लेकिन इन नदियों को प्रदूषण मुक्त कराने में रचनात्मक योगदान देने में दूसरे भारतीयों की तरह ही हैं।

यदि हमारे धर्माधिकारी चाहें तो गंगा और यमुना मैली नहीं हो सकती। सभी काम अदालतों के जिम्मे नहीं हो सकता। हमारे धार्मिक नेताओं को ही गंगा-यमुना समेत सभी नदियों की पवित्रता कायम रखने का दायित्व वहन करना होगा। वे चाहेंगे तभी यह हो सकता है अन्यथा नहीं।

-गजरौला टाइम्स न्यूज़.

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