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उत्तर प्रदेश नये सत्ता समीकरणों की ओर

मायावती-अखिलेश-उत्तर-प्रदेश

उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव एक साल के बाद होंगे। जिस प्रकार बिहार विधानसभा चुनाव ने भाजपा को जोर का झटका देकर उसके विरोधियों को विजय दिलायी, उसी तरह आबादी में सबसे बड़े राज्य में भी उसे बड़ा झटका लगने की संभावना लगातार बढ़ती जा रही है। यहां की भाजपा के विरोधी दल किसी ऐसे गठबंधन और रणनीति को व्यवहार में लाने में जुट गये हैं जिनके सहारे वे भाजपा को शिकस्त देकर सत्ता पर कब्जा कर सकें। ऐसे में भाजपा भी गंभीर मंथन और नयी रणनीति पर विचार कर रही है। कांग्रेस अभी खामोश है लेकिन सुगबुगाहट उसमें भी है।

डेढ़ साल पूर्व हुए लोकसभा चुनाव में यहां से 73 सीटें जीतने वाली भाजपा से यहां के मतदाताओं का लगातार मोह भंग होता गया है। यहां हुए पंचायत चुनावों में जिस तरह की पराजय का सामना भाजपा को करना पड़ा, उसी से ग्रामीण क्षेत्रों में उसकी गिरती लोकप्रियता का स्पष्ट पता चल रहा है। सपा और बसपा के मुकाबले वह कहीं भी नहीं ठहरती।

भले ही पंचायत चुनावों में सपा, बसपा के मुकाबले थोड़ा मजबूत दिखाई दे रही है लेकिन सपा उतनी भारी नहीं बनकर उभर पायी जितना सत्ताधारी होने के कारण उसे होना चाहिए था। इससे स्पष्ट होता है कि राज्य में सत्ता विरोधी लहर का सामना सपा को करना होगा।

मुलायम सिंह यादव और उनका कुनबा अच्छी तरह समझ रहा है कि इस बार सत्ता का रास्ता आसान नहींं। बिहार चुनाव में उनके द्वारा महागठबंधन के बाद तीसरा मोर्चा गठित कर चुनाव लड़ना उनके सामने बड़ी समस्या उत्पन्न करेगा। जिस अल्पसंख्यक समुदाय के मतों के सहारे वे भारी बहुमत से उत्तर प्रदेश की सत्ता में आये, उसी समुदाय में बिहार चुनाव के बाद सपा के खिलाफ अविश्वास का दौर शुरु हो गया है। लोगो का मानना है कि सपा बिहार में भाजपा के खिलाफ खड़े महागठबंधन को कमजोर करने के लिए चुनाव में कूदी थी। परंतु वहां की जनता ने मुलायम सिंह यादव के मंसूबों पर पानी फेर दिया। उनके द्वारा बनाये तीसरे मोर्चे के उम्मीदवारों की जमानतें जब्त हो गयीं।

लालू, नीतीश का गठबंधन उत्तर प्रदेश में चुनाव का ऐलान कर चुका है। अभी नहीं कहा जा सकता कि गठबंधन में कौन-कौन शामिल होंगे, लेकिन सपा को ये नेता शामिल करने वाले नहीं। वे बिहार का ताजा मामला याद रखेंगे। कांग्रेस भी सपा को साथ नहीं लेने वाली। मायावती और अजीत सिंह से भी सपा की नहीं बनने वाली। ऐसे में कांग्रेस, जदयू, राजद और मायावती और अजीत सिंह एक मंच पर आ सकते हैं।

भारतीय जनता पार्टी से गठबंधन को कोई भी दल तैयार नहीं दिखता वैसे मायावती और अजीत सिंह से गठबंधन की चर्चायें हैं। मायावती नये साल में अपनी स्थिति स्पष्ट करेंगी। अभी वे अकेले ही चुनाव लड़ने के मूड में हैं। वे सबसे मजबूत हालत में हैं। आगे उनकी रणनीति पर निर्भर होगा कि वे परिस्थितियों को कैसे अपने पक्ष में करने का प्रयास करती हैं।

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मौजूदा हालात में सबसे बड़ी समस्या कानून व्यवस्था और भ्रष्टाचार पर काबू करना है। किसान और मजदूर सबसे अधिक परेशान हैं। इसके लिए सपा व भाजपा एक दूसरे को दोषी कहकर दायित्व से बच रही हैं जबकि एक राज्य व दूसरी केन्द्र में सत्तासीन है। जनता इसे अच्छी तरह जानती है। इसीलिए वह दोनों से बुरी तरह नाराज हैं। चुनाव में ही वह अपना बदला लेती है। इसलिए दोनों को हिसाब चुकाना पड़ेगा। जिसका लाभ बसपा को जाना दिखता है। वह दायित्वमुक्त है इसलिए उससे बहुत कम नाराजगी है। इसी से यह भी हो सकता है कि वह किसी भी गठबंधन का हिस्सा न बनना चाहे। अकेले ही मैदान में उतरने का फैसला करे। यदि एक-दो प्रतिशत अधिक जोर पड़ने पर बसपा को लालू-नीतीश या कांग्रेस के गठबंधन में शामिल होने पर विचार भी करना पड़ा, तो बसपा अपनी शर्तों पर ही शामिल होगी। अब यह नेताओं पर निर्भर होगा कि वे क्या फैसला लेंगे? यह तो स्पष्ट दिख रहा है कि सपा के हाथ से उत्तर प्रदेश की सत्ता इस बार निकलना चाहती जबकि बसपा का आधार मजबूत हो रहा है। भाजपा और कांग्रेस बहुत कमजोर हैं।

-जी.एस. चाहल.

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