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क्या बिहार और गुजरात के ताजा नतीजों से सबक लेगी भाजपा?

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बिहार विधानसभा चुनाव की करारी हार के बाद गुजरात के पंचायत चुनाव में मिली पराजय से भाजपा की केन्द्र सरकार को समझ लेना चाहिए ग्रामीण भारत में उसे नापसंद किया जा रहा है। ग्रामीण मतदाता उससे बहुत नाराज हैं। यदि समय रहते उसने गांव वालों और किसानों की सुध नहीं ली तो उसे पंजाब और उत्तर प्रदेश में बहुत ही बुरे परिणाम भुगतने पड़ेंगे। इन दोनों राज्यों का किसान केन्द्र सरकार से सख्त नाराज है।

गुजरात जो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का गृह राज्य है वहां पंचायत चुनावों में भाजपा की हार का प्रमुख कारण वहां के किसानों की घोर उपेक्षा है। यह उपेक्षा उस व्यक्ति द्वारा की जानी जो लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान किसानों के हित के दावे करके प्रधानमंत्री बना हो और भी खतरनाक है।

मई 2014 में भाजपा द्वारा जारी चुनावी घोषणा पत्र में वायदा किया था कि सत्ता में आने पर वह किसानों को लागत के खर्च से पचास फीसदी का मुनाफा दिलायेगी। चुनाव जीतने के बाद किसानों के साथ मजाक किया गया। गुजरात के किसानों को जिस कपास पर मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली सरकार ने सन् 2012-13 में न्यूनतम मूल्य 7000 रुपये दिया था उसे घटाकर नरेन्द्र मोदी की सरकार ने 4050 रुपये कर दिया। इससे बड़ा धोखा गुजरात के किसानों के साथ और क्या हो सकता था? इसी से किसान समझ गये कि उन्हें ठगा गया है। मजेदार बात यह है कि अच्छा मूल्य मिलने के बावजूद नरेन्द्र मोदी अपने मुख्यमंत्रित्व कार्यकाल में कपास का मूल्य बढ़वाने के लिए बार-बार तत्कालीन मनमोहन सिंह सरकार को पत्र लिखते और प्रेस में इस तरह का प्रचार किया जाता था कि मोदी किसानों के लिए बहुत काम कर रहे हैं। दूसरों के किये काम का श्रेय लेने का भेद तब खुला जब उनकी सरकार ने कपास का मूल्य बढ़ाने के बजाय आधे के करीब ला दिया।

पिछले दिनों पाटीदार आंदोलन छिड़ने का मूल कारण किसानों के साथ किये मोदी सरकार का यह व्यवहार ही था। पाटीदार समुदाय के सभी परिवार गुजरात में कृषि से जुड़े हैं। पंजाब और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में इसी तरह जाट समुदाय हैं। गुजरात में 31 जिला पंचायतों में 22 पर कांग्रेस की विजय भाजपा के खिलाफ वहां के किसानों और ग्रामीणों की मंशा का स्पष्ट प्रमाण है। इससे पहले लगभग सभी सीटें भाजपा के पास थीं। किसान समझ गये कि केन्द्र की मोदी सरकार किसानों की सबसे बड़ी शत्रु है।

भाजपा के कई वाकप्रहरी सभी नगर निगमों की विजय को सफलता कहकर खुशफहमी में हैं। इस जीत से तो यह संदेश और भी स्पष्ट हो गया कि भाजपा गांवों के बजाय शहरी विकास को तरजीह दे रही है। लेकिन उसे समझना होगा कि गांव वालों के मतों के बिना सत्ता मिलना संभव ही नहीं और न ही गांवों के विकास के बगैर देश का विकास मुमकिन है। गुजरात में भाजपा को इसी कारण उस बड़ानगर पंचायत ने भी नकार दिया, जहां के मोदी हैं।

वोट मांगते समय जो मोदी किसानों और गांवों के विकास की बात करते थे। पीएम बनने के बाद वे उन्हें भूल गये तथा उसके विपरीत कृषि और किसानों के बजाय केवल बड़े-बड़े उद्योगपतियों और शहरीकरण की योजनाओं के लिए तिकड़म भिड़ाई जा रही हैं। इसीके साथ कहा जा रहा है कि सरकार गरीब और गांवों की तरक्की के लिए काम कर रही है।

केन्द्र की मोदी सरकार ने यदि बिहार और गुजरात के चुनावों में मिली हार का ईमानदारी से विश्लेषण नहीं किया और किसानों तथा गांव वालों के खिलाफ अपनी जारी नीतियों को नहीं उलटा तो यह निश्चित है कि उत्तर प्रदेश और पंजाब दोनों राज्यों में भी उसके विरोधी सत्तासीन रहेंगे। यह हम नहीं कह सकते कि सरकार किस की बनेगी लेकिन भाजपा को दोनों राज्यों में भारी पराजय का सामना करना पड़ेगा। इन राज्यों के किसानों में बिहार और गुजरात के किसानों से भी अधिक रोष केन्द्र सरकार के खिलाफ है। धान, गन्ना और गेहूं के प्रमुख उत्पादक इन दोनों राज्यों के किसानों को भी उनके उत्पादों का लागत के हिसाब से मूल्य नहीं मिल रहा।

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-जी.एस. चाहल.

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