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गरीबों की कमाई अमीरों के हवाले करने वाला समाजवाद

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उत्तर प्रदेश की सपा सरकार विज्ञापनों और विभिन्न प्रचार माध्यमों में जनता की कमाई के धन को खर्च कर जिस प्रकार अपनी प्रशंसा करने में लगी है, उससे न तो राज्य की जनता का कुछ भला हो रहा और न ही आगामी विधानसभा चुनाव में सपा को कोई लाभ मिलने वाला।

जनता के खून पसीने की कमाई के करोड़ों रुपये प्रतिदिन पहले से पूंजीपति बने बैठे टीवी चैनल मालिक और बड़े अखबारों के अमीर मालिकों को देकर और अमीर बनाने वाली, आम आदमी का कौन सा हित साध रही है।

बेहिसाब दौलत के मालिक बने बैठे फिल्म अभिनेताओं पर सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव और उनके कुनबे ने सैफई महोत्सव के नाम पर जो गरीब जनता का धन लुटाया उससे किस अल्पसंख्यक, पिछड़े या दलित किसान मजदूर का भला हुआ?

इसका जबाव और हिसाब मुलायम सिंह के कुनबे से लेने के लिए प्रदेश के वे सभी लोग तैयार बैठे हैं जिनके विकास के वादे चुनाव में करके अखिलेश यादव ने सत्ता हासिल की।

किसान वर्ष घोषित कर इस कृषि प्रधान राज्य के किसानों का मजाक उड़ाया जा रहा है। यह कैसा किसान वर्ष है जिसमें किसान को उसकी फसल का मूल्य नहीं दिया जा रहा। उसे अपना गन्ना बेचने को भी दर-दर की ठोकरें खानी पड़ रही हैं। उसके बाद उसका भुगतान भी नहीं हो रहा। भुगतान की मांग करने वालों पर मुकदमे तक ठोके गये हैं। भुगतान दबाये बैठे मिल मालिकों को राज्य और केन्द्र सरकारें बार-बार राहत पैकेज के नाम पर करोड़ों रुपये दे चुकीं। कहा जाता है किसानों के लिए पैसा दिया जा रहा है। आयेदिन नये-नये कर लादने के ढंग ईजाद किये जा रहे हैं।

आर्थिक बदहाली ने जहां ग्रामीण आबादी की कमर तोड़ दी वहीं शहरी इलाकों के व्यापारी भी मंदी के शिकार हो रहे हैं। हां सरकारी नौकरी करने वाले लोगों पर इसका कोई असर नहीं। उन्हें समय से वेतन मिल रहा है। लेकिन ऐसे लोग कम हैं तथा बेरोजगारों की संख्या लगातार बढ़ने से नवयुवकों में भी रोष है।

सरकार जमीनी हकीकत से या तो अनजान है या जानबूझकर उसे नजरअंदाज कर रही है। उसकी आंखें तब खुलेंगी जब चुनाव में जनता बदला लेगी।

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-जी.एस. चाहल.

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