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बुलेट गाड़ी से पहले अपना रेल सिस्टम सुधारा जाये

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हम भारत में अब बुलेट रेलगाड़ी की बात कर रहे हैं। हमें यह भी पता है कि यह उतना आसान नहीं है। वो अलग बात है कि देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जापान के पीएम से इस मसले पर समझौता कर चुके हैं। 

दुनिया में भारतीय रेलवे तीसरे स्थान पर आता है। वह सबसे बड़ा रेल नेटवर्क है। भारत में 7000 से ज्यादा रेलवे स्टेशन हैं। 1,31,205 रेलवे के पुल हैं। हमारे पास 51 हजार से अधिक पैसेंजर कोच हैं। हर रोज करीब 19 हजार रेलगाड़ियों का संचालन होता है। उनमें 12 हजार पैसेंजर गाड़ियां शामिल हैं।

इतिहास पर गौर करें तो 16 अप्रैल 1853 को भारत में पहली पैसेंजर ट्रेन शुरु हुई थी। उसके बाद से यहां बड़ा नेटवर्क विकसित होता गया।

दिन-रात ट्रेनें पटरियों पर दौड़ रही हैं। पटरियां भी समय के साथ पुरानी होती जा रही हैं। बहुत से ऐसे पुल हैं जो खस्ताहाल हैं और कभी भी बड़ी दुघर्टना का कारण बन सकते हैं। हमारा रेल विभाग उस ओर से अपनी आंखें बचाये हुए प्रतीत होता है। क्योंकि विभाग सही व्यवस्था करने में नाकाम रहा है।

जर्जर रेल लाइनों की मरम्मत करना और नई लाइनों को बिछाना उसकी प्राथमिकता होनी चाहिए, मगर वास्तव में ऐसा नहीं है।

हर साल जर्जर लाइनों के कारण हादसे हो जाते हैं। जान-माल का नुकसान भी होता है।

ट्रेनों के भीतर की बात की जाये तो वहां साफ-सफाई पर कोई ध्यान नहीं दिया जाता। गंदे टायलेट, आदि देखकर भारत की रेल व्यवस्था की खराबी का अंदाजा स्वतः ही हो जाता है।

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रेलवे स्टेशनों पर जिस तरह की अव्यवस्था और गंदगी रहती है उसे सही करने के बारे में कहा तो बहुत बार गया लेकिन असल में हुआ कुछ खास नहीं।

अब बुलेट रेलगाड़ी की बात की जा रही है। यह कदम अच्छा है। मगर सवाल वहीं का वहीं, कि पहले पुराना सिस्टम तो सही कर लिया जाये, नये पर बाद में बात की जाये।

पहले जो खराबी पहले से मौजूद है उसकी मरम्मत हो जाये। जब पटरियां अच्छी होंगी तो ट्रेन की गति बढ़ेगी। सफर आसान होगा। समय की बचत होगी। वह भारत की अर्थव्यवस्था के लिए हितकारी होगा।

साथ ही हम दूसरे देशों के कर्जदार भी होने से बच जायेंगे।

-टाइम्स न्यूज़ ब्लॉग.

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