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बेचारी गाय को तो पता ही नहीं

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गाय ने पिछले कई महीनों से भारत को प्रभावित किया है। इसके कारण राजनीतिक तौर पर जबरदस्त प्रभाव देखने को मिला है। यह कहना गलत नहीं होगा कि गाय पर अब निबंध उतने उत्साह के साथ स्कूलों में नहीं लिखवाये जाते, लेकिन गाय पर बड़े-बड़े लेख जरुर लिखे गये हैं।

दादरी कांड के बाद तो जैसे गाय 'हॉट टॉपिक’ की तरह हो गयी थी। अखबारों में गाय छायी रहती थी तो टेलीविजन पर गाय पर तीखी नोंकझोंक से टीआरपी बढ़ती थी। कुल मिलाकर गाय ही गाय सुनने-देखने को मिल रही थी। उसके बाद तो गाय को गूगल पर खूब सर्च किया गया।

याहू सर्च इंजन ने तो गाय को 'पर्सनेलिटी ऑफ दा इयर' ही घोषित कर दिया। बेचारी गाय इससे अंजान है। उसे पता ही नहीं कि वह साल 2015 की महान शख्सियत बन चुकी है। उसे मालूम नहीं कि वह हर किसी की जुबान पर है।

गाय ने पीएम मोदी, सलमान-शाहरुख, धोनी, सानिया, अंबानी-अडाणी, सबको पीछे छोड़ दिया।

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चार पावों वाले इस शाकाहारी जीव की चर्चा इसलिए भी अधिक रही क्योंकि भारत की राजनीति में चुनावी गरमाहट थी। बिहार विधानसभा चुनाव के कारण भाजपा और दूसरी पार्टियां लगभग रोज गाय को मुद्दा बनाकर चर्चायें करती रहीं।

लेकिन भाजपा को गाय ने जमीन पर लिटा दिया। इतना होने के बाद भी भाजपा के बड़बोले नेता गाय को लेकर बैठ जाते हैं। वैसे आजकल नया मुद्दा मिल गया है और वह है -अयोध्या में राम मंदिर निर्माण। उसके लिए तो पत्थरों की खेप भी चर्चा में है। 2017 में यूपी विधानसभा के चुनाव की गर्मी बढ़नी शुरु हो रही है जिसका गहरा असर आगे देखने को मिलेगा।

-हरमिन्दर सिंह चाहल.

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