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तिलक जंजु राखा प्रभु ताका

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सिखों के नवम् गुरु श्री तेगबहादुर साहिब का बलिदान किसी धर्म, सम्प्रदाय या जाति विशेष के बजाय मानवता के निमित्त था। आज जिस सहिष्णुता और असहिष्णुता पर तर्क-वितर्क हो रहा है तथा देश में आपसी सौहार्द के खिलाफ माहौल बन रहा है, ऐसे में गुरु जी के बलिदान का स्मरण करना बहुत ही प्रासंगिक है।

गुरु नानक देव जी ने जिस यज्ञोपवीत को पहनने से ही इंकार कर दिया था तथा उनके परवर्ती बाकी सभी नौ गुरुओं ने भी कभी जनेऊ धारण नहीं किया और न ही अपने सिखों को इस मर्यादा पालन का आदेश दिया। उसी परम्परा को जारी रखने वाले नवम् गुरु तेगबहादुर साहिब ने यज्ञोपवीत और तिलक की रक्षा के लिए अपने जीवन का बलिदान दिया।

इस तरह के त्याग और बलिदान का एक भी उदाहरण इतिहास में नहीं है। गुरु जी तिलक और जनेऊ स्वंय धारण नहीं करते थे, लेकिन जिन लोगों की इन दोनों मर्यादाओं के प्रति आस्था थी, वे उन्हें ऐसा करने से रोकने के भी खिलाफ थे। वे दूसरों की आस्था को चोट पहुंचाने के सख्त खिलाफ थे।

जब कश्मीरी पंडितों के तिलक और जनेऊ पर संकट आया, तो गुरु जी उनकी आस्था के हित में आगे खड़े हो गये तथा अपना जीवन ही उनके लिए बलिदान कर दिया। वे सभी को अपनी-अपनी आस्थाओं के अनुसार मर्यादा पालन करने के पक्षधर थे। भले ही वे वे एक दूसरे के विपरीत हों।

इतिहास में ऐसे उदाहरण भरे पड़े हैं जब अपने-अपने धर्म या पंथ की परंपराओं को लागू कराने के प्रयास करने वाले महापुरुषों की लम्बी कतार है। लेकिन ऐसा उदाहरण दुर्लभ है जब किसी ने दूसरे धर्म की मान्यताओं की रक्षा के लिए बलिदान या संघर्ष किया हो। ऐसा केवल गुरु तेगबहादुर जी ने ही किया।

वे कमजोर के साथ उसकी आस्था के लिए शहीद हुए। वे न तो हिन्दू धर्म को मानते थे और न ही इस्लाम उनका मजहब था लेकिन वे दोनों धर्मों को मानने वालों की आस्था पर चोट करने के हमेशा खिलाफ थे। दुनिया में सहिष्णुता का इससे बड़ा उदाहरण और क्या होगा?

गुरु तेगबहादुर की शहादत के बाद दसम् गुरु गोविन्द सिंह जी ने ठीक ही कहा था -
'तिलक जंजु राखा प्रभु ताका, कीनो बडो कलू महिं साका।।’

भावार्थ है - तिलक और जनेऊ की प्रभुता की रक्षा के लिए कलयुग में गुरु तेगबहादुर जी ने अतुलनीय बलिदान दिया।

गुरु तेगबहादुर की सारी वाणी हिन्दी में है

गुरु तेगबहादुर साहिब जी छठे गुरु हरगोविन्द साहिब के बेटे थे। उन्हें नवें गुरु के रुप में अष्टम् गुरु हरिकिशन जी महाराज ने अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया था। गुरुजी की सम्पूर्ण वाणी गुरु ग्रंथ साहिब में दर्ज है। उनकी संपूर्ण वाणी भक्ति रस का अथाह भंडार है।

हिन्दी में लिखी यह वाणी व्यक्ति को लोक और परलोक में सद्गति प्रदान करने का साधन है। हिन्दी भारत का आम आदमी भी आसानी से समझ सकता है।

एक श्लोक प्रस्तुत है -
'भय काहू को देत नहि, नहिं भय मानत आन।
कहु नानक सुन रे मना ज्ञानी ताही बखान।।’

उन्होंने सांसारिक रिश्तों को महत्वहीन मानते हुए कहा है —
'धन दारा सम्पति सगल, जिनि अपनी कर मान।
इन में कछु संगी नहीं, नानक बिन भगवान।’

-जी.एस. चाहल.

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