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नयी खण्डपीठ के लिए वकीलों का समर्थन जरूरी

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उच्च न्यायालय इलाहाबाद की खण्डपीठ पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसी ऐसे शहर में स्थापित होने की मांग उठना स्वाभाविक और न्यायिक है। जहाँ पहुँचने में लोगों को कम समय, कम दूरी और कम खर्च वहन करना पड़े। अमरोहा समेत पश्चिमी उत्तर प्रदेश के वकील दिल्ली व अन्य जगहों पर इसके समर्थन में आन्दोलन कर न्याय की सच्ची वकालत कर चुके हैं। यह बेहद शर्मनाक, अफसोसजनक और नासमझी की बात है कि बेहद महत्वपूर्ण मुद्दे पर नेता, जनप्रतिनिधि और आम लोग बिल्कुल खामोश है। कोई सामाजिक संगठन भी इस बारे मे कुछ बोलने को तैयार नहीं है।

हम सभी जानते है कि इलाहाबाद उत्तर प्रदेश के पश्चिमी जनपदों से बिहार के दर्जनों जनपदों के करीब पड़ता है। लोगों को न्याय का दरवाजा खटखटाने में ही इतनी परेशानी का सामना करना पड़ता है कि वह न्याय की उम्मीद ही छोड़ बैठता है। एक गरीब जो अपने मकान, जिसकी कीमत लगभग बीस या तीस हजार होती है यदि कोई धनवान कब्जा कर ले तो उसे इलाहाबाद जाने और वहाँ के वकील से प्रार्थना पत्र लगाने में ही सब कुछ लुटाना पड़ेगा। उसके बाद तारीख दर तारीख वह कहाँ तक लड़ेगा? वह मजबूरी में मकान ही छोड़ बैठेगा। यदि होई कोर्ट इलाहाबाद के बजाय सौ या पचास किलोमीटर पर हो तो वह वहाँ पहुँच भी सकता है। बल्कि आजाद देश में तो न्याय लोगों की चौखट तक पहुँचना चाहिए। हमें अंग्रेजी हुकूमत के कायदे कानूनों को दरकिनार करने में अभी कितना समय लगेगा?

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव कहते है कि वे इलाहाबाद हाईकोर्ट की खण्डपीठ के विभाजन के खिलाफ हैं। पूर्व मुख्यमंत्री और बसपा सुप्रीमो मायावती भी पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हाई कोर्ट की बेंच नहीं बनवा पाई। कांग्रेस केन्द्र में सत्ता होते हुए भी लोगों की मजबूरियों को नहीं समझ पायी। यह पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सबसे गरीब लोगों के साथ सबसे बड़ा अन्याय है। यदि इस अन्याय के निराकरण हेतु यहाँ के वकील आवाज उठाते है तो न्यायिक दायित्वों को सबसे बेहतर निर्वहन करते है। उस क्षेत्र की जनता को उनके इस कार्य में भागीदार बनकर आवाज उठानी चाहिए। इसमें किसी जाति, धर्म या वर्ग व सम्प्रदाय का भी सवाल नहीं है। एक अमीर तो इलाहाबाद से भी आगे जाकर अपने लिए न्याय की जंग लड़ सकता है लेकिन एक गरीब जिसके पास खाने और पहनने का खर्च वहन करने की भी बेहद सीमति क्षमता है वह तो ऐसें में न्याय की उम्मीद भी नहीं कर सकता।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश ही नहीं बल्कि उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्यों में तो कई उच्च न्यायालय होने चाहिए। इसके लिए वकीलों को जन सम्पर्क करना चाहिए।

-टाइम्स न्यूज़ अमरोहा.

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