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विदेशी मेहमानों की आस में थक गयीं झील की आंखें

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हस्तिनापुर वन क्षेत्र में वन सम्पदाओं के बेजा दोहन और कालीढाब पर अवैध कब्जों के चलते इस बार अभी तक साइबेरियन क्रेन पक्षी नहीं आये हैं। इन सुन्दर और आकर्षक विदेशी मेहमानों का जमावड़ा देखने को आतुर पक्षी प्रेमियों की आंखें पथरा गयीं लेकिन किसी भी पक्षी के काली ढाब झील के पास दर्शन नहीं हुए।

यहां प्रतिवर्ष दिसंबर माह में साइबेरिया से लंबी दूरी तय करके सैकड़ों जोड़े क्रेन पक्षी आते हैं। जो इस झील के स्वच्छ जल में क्रीड़ा करते हैं तथा शीत ॠतु समाप्त होने के बाद बसंत आगमन होते ही अपने देश चले जाते हैं। इनकी संरक्षा और सुरक्षा का दायित्व वन विभाग के कारिन्दों पर है।

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काली ढाब झील की तस्वीरें देखें>>

वर्षों से विभागीय कारिन्दों तथा निकटस्थ गांवों के किसानों की मिलीभगत से झील पर अवैध कब्जे बढ़ते जा रहे है। झील के विशाल क्षेत्र पर कब्जा कर गन्ने की खेती की जा रही है। जिससे झील संकुचित हो गयी। हो सकता है चारों ओर गन्ने और ऊंची-ऊंची फसलों से घिरने पर झील इन पक्षियों को संतुष्ट न कर पा रही हो। ये पक्षी तैरने के बाद खाली किनारों पर कुछ समय को सुस्ताने के लिए खड़े रहते हैं। सारस की तरह लंबी टांगों और विशाल शरीर में लंबी चोंच के साथ बहुत ही सुन्दर दिखाई देते हैं। कोलाहल से वातावरण सुहाना हो जाता है।

वन क्षेत्राधिकारी इकबाल खां के मुताबिक उन्हें बेसब्री से अपने मेहमानों का इंतजार है। वे अभी तक पक्षियों के ना आने के पीछे मौसमी बदलाव को जुम्मेदार मानते हैं। झील पर अवैध कब्जों के प्रति वे जानबूझकर अनजान होने का नाटक करते हैं। वन क्षेत्र से कीमती जड़ी-बूटियां अवैध रुप से बाहर जाने की भी खबरे हैं। वनस्पति असंतुलन भी पक्षियों के आकर्षण पर प्रभाव डालता है।

-टाइम्स न्यूज़ गजरौला.

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