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कुछ तो है, जो गजरौला नहीं छोड़ना चाहते कामिल

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भगतजी के भूखंड को लेकर नगर पालिका में आये तूफान के लिए यहां 13 वर्षों से भी लंबे समय से तैनात इ.ओ. कामिल पाशा उत्तरदायी है। पालिका अध्यक्ष के संज्ञान के बिना और पालिका बोर्ड की अनुमति के अभाव में एक विवादित भूखंड को, जिसपर एक दलित चालीस वर्षों से कब्जा किये हैं, एक एनजीओ को निर्माण के लिए दे देना ही इ.ओ. की कार्यप्रणाली पर प्रश्न खड़ा करने को काफी है।

सभासदों और चेयरमेन ने पूछा तो उन्हें बताया गया कि पालिका बोर्ड के प्रस्ताव के बाद प्लाट आवंटित किया गया है। जबकि ऐसा हुआ ही नहीं था। सभासद और चेयरमेन इस तरह के किसी भी प्रस्ताव से पूरी तरह असहमति व्यक्त कर रहे हैं। इसी से पता चलता है कि इ.ओ. ने निजि लाभ के लिए स्वेच्छा से फैसला लेकर प्लॉट आवंटित कर दिया।

सभासदों ने इ.ओ. के मुंह पर स्पष्ट कहा है कि इसमें पैसा लिया गया है। वास्तव में इ.ओ. कामिल पाशा यहां लंबे समय तक जमे रहने के कारण गजरौला तथा उसमें समाहित पांच अन्य गांवों की परती भूमि के बारे में सबकुछ जानते हैं। उनके कार्यकाल में तीन चेयरमेन रह चुके।

महेन्द्र सिंह का कार्यकाल समाप्त होने और रोहताश का शुरु होने के बीच कई माह तक एसडीएम के प्रशासक बनने पर पूरा काम उन्हीं के हाथ में रहा। अपने कार्यकाल के सभी नगर प्रमुखों और प्रशासकों से अधिक यहां के भूखंडों का उन्हें ज्ञान रहा है। वे मौका मिलते ही नगर की संपत्ति खासकर भूखंडों पर अवैध कब्जे दिलाते रहे हैं। इसमें उन्होंने करोड़ों की अवैध कमाई की है। जिसकी ईमानदारी से जांच की जाये तो इ.ओ. पाशा के कारनामे उजागर हो सकते हैं।

यहां की औद्योगिक इकाईयों को नगर पंचायत के टैक्स में भी छूट दिलाने में इ.ओ. को महारत है। यही कारण है कि इ.ओ. यहां से जाना नहीं चाहता। जिले में सभी नगरों व नगर पंचायतों के इ.ओ. कई-कई बार बदले जा चुके लेकिन यहां 12 वर्षों से भी अधिक समय से इ.ओ. का तबादला नहीं हुआ।

अवैध कमाई के बल पर ही स्थानांतरण रुकवाया जाता है। लखनऊ में पंचम तल पर कोई न कोई वरिष्ठ अधिकारी से इ.ओ. के मजबूत संबंध हैं।

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-टाइम्स न्यूज़ गजरौला.

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