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लड़ाई विचारों की है, पुराने जख्म कुरेदने की भी है

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अरविन्द केजरीवाल को घेरने का मौका अगर भारतीय जनता पार्टी चूक जाये तो उसकी राजनीति का कोई मतलब नहीं। वहीं यदि आम आदमी पार्टी ऐसा मौका चूक गयी तो वह भी राजनीति करने के लायक नहीं। जबकि कांग्रेस मौका मिलने का इंतजार करती है।

आजकल जिस तरह की राजनीतिक त्योरियां चढ़ी हुई हैं उससे एक अलग किस्म की राजनीति का प्रारंभ हुआ है। 2015 का हर महीना इसी रंग में डूबा दिखा। 2016 की शुरुआत तो कठोर ठंड से शुरु होगी, मगर राजनीतिक तौर पर यह उससे कुछ ज्यादा कठोर हो सकती है।

डीडीसीए में घोटाले के जो आरोप वित्त मंत्री अरुण जेटली पर आप ने लगाये उससे भाजपा की बौखलाहट देखते ही बनती है। वह अपनी पाली किसी कीमत पर नहीं गिरने देना चाहती।

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भाजपा को लगता है कि यदि जेटली पर आंच आती है, तो उससे पार्टी को बहुत बड़ा नुकसान होगा। पहले ही पार्टी पर आरोपों की बौछार होती रही है।

ललित मोदी से लेकर सुषमा स्वराज और वसुंधरा राजे सिंधिया जैसे लोगों पर गंभीर आरोप लगाये गये हैं। व्यापम की आंच से मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान तक खुद को अबतक बचाते फिर रहे हैं।

कीर्ति आजाद जो बीजेपी के दरभंगा से सांसद हैं उन्होंने जो आरोप लगाये वे सबसे ज्यादा चौंकाने वाले थे। उससे भाजपा को जरुर नुकसान हुआ है। वो अलग बात है कि पार्टी प्रवक्ता कभी नहीं कहेंगे कि उससे कुछ फर्क पड़ा है।

पिछले कुछ महीनों के चुनावों पर नजर डालें तो पता चलेगा कि भाजपा की बदलती छवि का असर उसपर विश्वास करने वाले वोटरों पर पड़ा है।

ताजा निकाय चुनावों की बात की जाये तो मध्य प्रदेश में उसे 8 निकाय में से सिर्फ 3 में जीत मिली। जबकि उसकी विरोधी कांग्रेस ने 5 निकाय अपने नाम किये। यह उस राज्य का हाल है जहां भाजपा के मुख्यमंत्री का तीसरा कार्यकाल है।

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गुजरात निकाय में भी भाजपा को नुकसान हुआ है। ग्रामीण क्षेत्रों में उसे जबरदस्त हार का सामना झेलना पड़ा और शहरी क्षेत्रों में पहले से उसकी सीटें कम हुई हैं।

इनसे साफ लगता है कि बीजेपी का ग्राफ ठहरा हुआ नहीं, वह नीचे जा रहा है। हर छोटे-बड़े चुनाव के बाद उसका नीचे गिरना जारी है। दिल्ली के बाद बिहार उसके लिए किसी बड़े सदमे से कम नहीं कहा जा सकता।

केजरीवाल पर मानहानि करने के बाद भाजपा शायद खुश है क्योंकि वह कानूनी तौर पर खुद को मजबूत माने बैठी है। ऐसा भी नहीं है कि यह लड़ाई विचारों की है, यह लड़ाई पुराने जख्मों को कुरेदने की भी है।

-हरमिन्दर सिंह चाहल.
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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