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जाट-जाटव एकता का मौसम है उत्तर प्रदेश में

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बसपा सुप्रीमो मायावती उत्तर प्रदेश में 2017 में होने वाले विधानसभा चुनावों में विजय प्राप्त करने के लिए क्या रणनीति बनायेंगी यह खुलकर सामने नहीं है लेकिन वे उसे सफल बनाने के लिए खाका जरुर तैयार कर चुकी हैं और समय आते ही वह सबके सामने होगा। उनकी नीति के संकेत मिलने शुरु हो गये हैं। इस बार का चुनाव पिछले दो बार के विधानसभा चुनावों से भिन्न होगा।

2007 और 2012 के चुनावों में सपा और बसपा में आमने-सामने की टक्कर थी। कांग्रेस तथा भाजपा दोनों राष्ट्रीय दल हाशिये पर चले गये थे। रालोद की स्थिति भी इन दोनों से भिन्न नहीं थी।

इस बार ऐसा नहीं होने वाला। इस बार भाजपा और कांग्रेस पिछले दोनों दौर के चुनावों से भिन्न स्थिति में हैं तथा इसी के साथ असदउद्दीन ओवैसी भी इस बार यहां अपनी पार्टी को मैदान में उतारेंगे। जिला पंचायत चुनाव में वे आजमगढ़ में सपा पर भारी पड़े और जीत हासिल करने में कामयाब भी रहे।

बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजों ने सत्ताधारी सपा के खेमे में बेचैनी पैदा कर दी है। मुलायम सिंह यादव ने बिहार चुनाव में छह दलों का तीसरा मोर्चा चुनावी दंगल में शामिल कर अपनी किरकिरी करायी है। धर्मनिरपेक्ष छवि वाले दल इससे उनपर भाजपा से तालमेल का आरोप लगा रहे हैं। वे भाजपा के विरोध की तरह ही सपा के खिलाफ भी एकजुट होकर मोर्चाबंदी करने पर विचार कर रहे हैं। सपा से इस बार बहुसंख्यक मतदाता भी खुश नहीं तथा उनकी ताजा भूमिका ने अल्पसंख्यकों में भी बेचैनी पैदा कर दी है। कई मुस्लिम नेताओं ने मुलायम सिंह पर मुस्लिम मतों के बलपर परिवारवाद को सत्ता पर हावी करने का खुलेआम आरोप भी लगाया है।

सरकार में प्रभावशाली पदों पर यादवों को सत्तासीन किये जाने से हिन्दुओं के दूसरे समुदाय भी सपा के खिलाफ होते जा रहे हैं। जाट और जाटव दोनों सपा और भाजपा पर उनके साथ भेदभाव का आरोप लगा रहे हैं। ऐसे में जाट-जाटव समुदाय प्रदेश में करीब आने शुरु हो गये हैं।

इन दोनों वर्गों के शिक्षित लोगों का तर्क है कि सदियों से जाट और जाटव साथ-साथ रहते आये हैं। एक ही गांव में एक साथ खेतों में काम करते आ रहे हैं। यदि जाटव भाई भूमिहीन थे तो जाट भाई उन्हें अपने खेत में बटाई या मजदूरी के साथ भरण-पोषण कराते रहे हैं। दोनों साथ-साथ कमा कर एक-दूसरे को रोजी-रोटी का सहरा देते रहे हैं। अब बराबर हो गये बल्कि राजनीति में जाटव उत्तर प्रदेश में जाटों से संख्याबल अधिक होने से आगे बढ़ गये। ऐसे में अब इन दोनों समुदायों को एक साथ आना समय की जरुरत है।

उधर सपा से मोहभंग होने से मुसलमानों का एक बड़ा वर्ग भी मायावती के साथ आ रहा है। जाट और मुस्लिम मतों का जुड़ाव मायावती को सत्ता के केन्द्र तक पहुंचाने में बड़ा मददगार होगा। दूसरे वर्गों का भी मत उन्हें मिलना ही है। बसपा का परंपरागत दलित मतदाता लोकसभा चुनाव में भले ही भाजपा की ओर मुड़ा था लेकिन विधानसभा चुनाव में वह बहनजी के अलावा कहीं नहीं जाने वाला।

कांग्रेस भले ही कोशिश करे लेकिन पिछले विधानसभा चुनाव से थोड़ा बेहतर ही वह कर पायेगी। भाजपा भी कांग्रेस जैसी स्थिति में ही है। रालोद को बसपा से गठबंधन में लाभ रहेगा। उसे जाट-जाटव एकता के समय को पहचानना चाहिए।

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-जी.एस. चाहल.

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