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शराब के सुरुर में विकास की तस्वीर

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पंचायत चुनावों में उम्मीदवार सबसे अधिक धन शराब पर खर्च कर रहे हैं। निर्वाचन आयोग की तमाम बंदिशों के बावजूद चुनाव में शराब का प्रचलन घटने के बजाय बढ़ता जा रहा है। मतदाताओं की सबसे पहली मांग भी यही है।

मतदाता ऐसे उम्मीदवारों को बिल्कुल भी पसंद नहीं कर रहे जो उन्हें शराब नहीं पिला रहे। पूरे उत्तर प्रदेश में कोई गांव ही ऐसा होगा जहां चुनावी लड़ाई में इस हथियार का इस्तेमाल नहीं हो रहा।

बहुत से गांव जहां निर्धन और पिछड़ी आबादी है, वहां कच्ची शराब तैयार करके मतदाताओं को परोसी जा रही है। सरकारी दुकानों की महंगी सुरा जिसमें देसी और अंग्रेजी दोनों तरह की शराब शामिल है, भी खूब चल रही है। धनी उम्मीदवार अपने समर्थकों में अंग्रेजी शराब बांट रहे हैं। कुछ लोग तो दिन निकलने से दिन ढलने तक काम चालू रखते हैं जबकि अधिकांश गांवों में रात में धड़ल्ले से खूब काम चल रहा है। पहले चरण में भी यही हालत थी। पुलिस प्रशासन के वे कर्मचारी जिन्हें इसपर निगाह रखने को तैनात किया गया है, वे कई कारणों से इसमें दखल देने से बच रहे हैं बल्कि उनमें से बहुत से सहयोगी की भूमिका में भी हैं।

मिठाईयां, पकौड़ियां और कई जगह नकद राशि की भी खबरे हैं। यह चुनाव मतदाताओं को लुभाने में पिछले सभी चुनावों में रिकॉर्डतोड़ रहा है। फिर भी निर्वाचन आयोग हाल ही में संपन्न हुए जिला पंचायत और बीडीसी चुनावों की तरह तय सीमा में खर्च करने के प्रमाण पत्र इस चुनाव में भी दे देगा। साथ ही श्रेष्ठ लोकतंत्र होने के ढिंढोरे पिट जायेंगे।

दावतें उड़ाने वाले ग्रामीणों का कहना है कि वे जानते हैं कि अगले पांच साल तक चुना हुआ व्यक्ति विकास के नाम पर पिछले लोगों का इतिहास दोहराने से अधिक नहीं करने वाला इसलिए अब तो जो लिया जा रहा है, वही अधिक से अधिक लेना ही बेहतर है। विकास के नाम पर आने वाले पैसे को प्रधान अपनी इच्छा से खर्च करेगा।

उम्मीदवार भी जानते हैं कि खर्च के बल पर ही लोग उसे कुर्सी सौंप सकते हैं। इस लिए बाद में ब्याज सहित वसूल किया जायेगा। ऐसे में ग्रामीण विकास की योजनायें राह भटक रही हैं। विकास के नाम का धन शराब जैसी विनाशक चीज पर खर्च हो रहा है। बाद में भ्रष्ट सरकारी कर्मचारी और सफेदपोश मिलकर इसकी बंदरबांट कर लेते हैं। में प्रतिवर्ष विकास के दर्जनों मदों में जारी होने वाली भारी भरकम राशि के बावजूद हमारे गांवों की हालत में कोई सुधार होता नहीं दिखता।

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-जी.एस. चाहल.

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