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उत्तर प्रदेश में भी महागठबंधन की तैयारी

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उत्तर प्रदेश के आगामी विधानसभा चुनावों में नये राजनीतिक समीकरणों का उदय होगा। इसके स्पष्ट संकेत अभी से मिलने शुरु हो गये हैं। बिहार के मुख्यमंत्री नितीश कुमार और रालोद मुखिया चौ. अजीत सिंह के बीच हाल ही में दिल्ली में हुई सकारात्मक मुलाकात से इन संकेतों को और मजबूती मिली है। दोनों नेता बिहार में सफल रहे महागठबंधन की तर्ज पर उत्तर प्रदेश में भी कई दलों के गठबंधन के सहारे सरकार बनाने की भूमिका बनाने में जुटने को तैयार हो गये हैं। जदयू के वरिष्ठ नेता यहां गठबंधन में शामिल होने वाले दलों की संभावना तलाशने में सक्रिय भी हो गये हैं।

प्रदेश की सत्ता पर काबिज समाजवादी पार्टी को इस महागठबंधन में शामिल करने पर अभी कोई विचार नहीं हो रहा जबकि बसपा सुप्रीमो मायावती स्वयं ही इस तरह के गठबंधन से दूर रहना चाहती हैं। गठबंधन के नेताओं को भरोसा है कि कांग्रेस बिहार की तरह यहां भी गठबंधन में शामिल होगी। बिहार में जहां महागठबंधन का मुकाबला केवल भाजपा और उसके साथी दलों से था, उत्तर प्रदेश में स्थिति उससे अलग है।

यदि सपा और बसपा इस गठबंधन से अलग रहे तो यहां आमने-सामने के बजाय लड़ाई भाजपा, सपा, बसपा तथा इस नये गठबंधन के बीच बहुकोणीय हो जायेगी। यदि बसपा और भाजपा एकजुट हुए तबभी सपा तथा गठबंधन में त्रिकोणीय मुकाबला होगा। जो लोग सपा और बसपा गठबंधन की बात कर रहे हैं, वह केवल अटकलबाजी के सिवा कुछ नहीं, लेकिन राजनीति में कुछ भी संभव है कि तर्ज पर यह संभव भी हो सकता है। यदि ऐसा हो गया तो यह अजेय गठबंधन होगा। हालांकि यह भरोसे लायक नहीं लगता।

23 दिसम्बर को नई दिल्ली में किसान मजदूर संगठन के नेता स. वीएम सिंह ने भी एक नयी पार्टी की घोषणा की है। उनके साथ उत्तर प्रदेश के किसानों की अच्छी तादाद है। नितीश और अजीत अपने साथ यदि इस नयी पार्टी को भी ले लें तो गठबंधन, वास्तव में महागठबंधन बन सकता है।

यह पक्का है कि जो पार्टी या गठबंधन राज्य के किसानों और मजदूरों का विश्वास प्राप्त करने में सफल रहेगा, बहुमत उसी के पक्ष में जायेगा। इसी के साथ यह हकीकत है कि उत्तर प्रदेश का किसान और मजदूर राज्य की सपा तथा केन्द्र की भाजपा सरकार से बेहद नाराज है।

दोनों ही सरकारें एक-दूसरे पर दायित्व डालकर उपरोक्त दोनों वर्गों की उपेक्षा कर रही हैं। यही कारण है कि लोग, जहां जनमत के सहारे यादव परिवार का भरण पोषण करने वाली सपा के खिलाफ हैं वहीं जनता के मन की बात न सुनने वाले अपने ही मन की बात करने वाले नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली केन्द्र की भाजपा सरकार से नाराज हैं।

बसपा सुप्रीमो मायावती की सोशल इंजीनियरिंग बीते संसदीय चुनाव में उन्हें जीरो पर ले आयी थी। उन्हें सपा की प्रमुख प्रतिद्वंदी पार्टी मानने वाले कुछ लोग भले ही समर्थन दे दें।

उपरोक्त हालात प्रस्तावित महागठबंधन के हक में दिखाई पड़ रहे हैं। महागठबंधन के बिहार जैसे परिणाम प्राप्त करने के लिए बसपा को भी साथ में लेना चाहिए। भले ही मायावती को गठबंधन की नेता बनाना पड़े। यदि इस समय सपा, बसपा, भाजपा, कांग्रेस और रालोद यहां अलग-अलग अकेले-अकेले चुनाव लड़े तो बसपा ही सबसे अधिक सीटें लेने में सफल रहेगी।

बिहार में राजद, जदयू तथा कांग्रेस ने बहुत ही सहजता और विवेकशीलता के साथ न्यायिक ढंग से सीट बंटवारा किया था। वह यहां संभव नहीं। मायावती और मुलायम सिंह के साथ यहां इसी कारण महागठबंधन होना कठिन बल्कि नामुमकिन लगता है। हां, मुलायम सिंह यादव ने जो व्यवहार बिहार में महागठबंधन के साथ किया, उसका बदला नीतीश कुमार उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह से भली प्रकार ले सकते हैं।

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मुलायम सिंह बिहार में चुनाव लड़कर महागठबंधन का बाल बांका तक नहीं कर पाये लेकिन नीतीश का यूपी में बनने जा रहा महागठबंधन उन्हें अच्छा सबक देने को पर्याप्त है। पूर्वी उत्तर प्रदेश में नीतीश और लालू तथा पश्चिमी उत्तर प्रदेश में रालोद और कांग्रेस काफी हैं। एमआइएम के अध्यक्ष ओवैसी भी यहां उम्मीदवार खड़े कर सपा के मुस्लिम मतों में सेंधमारी कर उसे कमजोर ही करेंगे। ओवैसी पंचायत चुनाव में सपा के गढ़ से शुरुआत कर भी चुके।

यह तो पक्का हो गया कि बिहार की तर्ज पर नीतीश कुमार उत्तर प्रदेश के चुनाव में भी एक महागठबंधन मैदान में उतारेंगे। यह समय आने पर पता चलेगा कि उसमें कौन-कौन से दल शामिल होंगे। उसी के बाद पता चलेगा कि भाजपा और सपा के सत्ता पर दावे को वह चुनौती देने में कहां तक सफल होगा अथवा यूपी की कुर्सी की ओर देख रही बसपा सुप्रीमो का मंतव्य सफल होगा।

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-जी.एस. चाहल

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