बादशाह दरवेश गुरु गोविन्द सिंह

कबीर साहब का कथन है कि 'सात समुद्र की मसि करुं लेखनि सब बनराय, सबधरती कागद करु गुरु गुन लिखा न जाय।’ अर्थात् सातों समुद्रों की स्याही बनाऊं, सारे वनों को काटकर लेखनी तैयार कर लूं और समस्त भूमंडल को कागज मानलें तब भी मैं गुरु के गुणों का संपूर्ण वर्णन नहीं कर पाऊंगा।

गुरु गोविन्द सिंह के जीवन चरित्र और उनके द्वारा किये कार्यों का वर्णन करने का जब भी विचार किया जाता है, तो हर किसी के सामने यही समस्या आती है। बड़ा-बड़ा विद्वान व्यक्ति गुरु जी के किसी भी पक्ष पर बहुत कुछ लिखने के बाद भी यही सोचने को बाध्य होता है कि उसने कुछ भी नहीं लिखा। मेरे जैसे अल्पज्ञ के बारे में आप स्वयं अनुमान लगा सकते हैं कि क्या लिख सकता हूं। उनके जन्मदिवस के अवसर पर गुरुजी का स्मरण कर लेना भी पुण्य का काम है।

गुरु पर्व के मौके पर देखने में आया है कि प्रायः वक्ता गुरु जी की शूरवीरता का बखान करते हुए उनके द्वारा लड़े युद्धों आदि का वर्णन ही करते हैं। उनके जीवन के बहुपक्षीय जीवन के अधिकांश पक्ष अनछुये ही छोड़ दिये जाते हैं। यही नहीं काव्य के उदाहरण भी वीर रस से ही संबंधित पेश किये जाते हैं। इन मौकों पर मौजूद श्रोता ऐसे भाषणों आदि को सुनकर यही आकलन करते हैं कि गुरु जी का एकमात्र उद्देश्य अपने विरोधियों को अपने बाहुबल और युद्ध कला द्वारा पराजित कर उनपर एकाधिकार चाहते थे।

विशेष ध्यान देने योग्य बात यह है कि गुरु गोविन्द सिंह जी की ओर से उनसे विरोध रखने वालों पर कभी भी आक्रमण नहीं किया गया, न ही वे युद्ध करना चाहते थे। वे तो बेहद शांतिप्रिय संतात्मा थे। उनके खिलाफ साजिश रखने वालों ने बार-बार तत्कालीन सत्ता को उकसा कर बार-बार उनपर हमले कराये, तो गुरु जी ने आत्मरक्षार्थ तलवार उठायी। कमजोरों पर जब ताकतवर अत्याचारियों ने जुल्म ढाने की कोशिश की तो वे उनके लिए ढाल बने। उन्होंने संत, सिपाही तथा बादशाह और दरवेश की भूमिका न्याय की रक्षा को अपना तन, मन, धन तथा परिवार तक बाजी पर लगाया। उन्होंने जीवनभर किसी पर भी हमला नहीं किया। बल्कि उनपर आक्रमण किये जाते रहे।

वे विद्वानों का बहुत आदर करते थे तथा स्वयं बहुभाषी महाकवि थे। उन्होंने विशाल काव्य की रचना की है। जिसमें ब्रजभाषा, हिन्दी, पंजाबी और फारसी भाषा में भक्ति, युद्धकला, शक्ति तथा सामाजिक जीवन के विभिन्न पहलुओं पर विराट काव्य साहित्य शामिल है। जाप साहिब जैसी भक्तिपूर्ण रचना संस्कृत, हिन्दी और फारसी काव्य की अनूठी कृति है। इसमें ईश्वर के कर्मवाची नामों से स्तुति की गयी है।

'कृष्णावतार’ गुरु गोविन्द सिंह जी की ब्रजभाषा में श्रंगार प्रधान काव्यकृति है। जिसमें श्री कृष्ण की बांसुरी और राधा-कृष्ण मिलन का बेहद आलंकारिक भाषा में वर्णन है। सवैया छन्द अन्यंत माधुर्यपूर्ण है। इस काव्य ग्रंथ में काव्य तथा संपूर्णता के साथ भाव पक्ष प्रधान है।

'रामवतार’ काव्य कृति में गुरु गोविन्द सिंह जी ने अपनी काव्य कला का परिचय खासतौर से सीता चरित्र के वर्णन में दिया है। गुरु जी एकेश्वरवादी थे। इन ग्रंथों की रचना का उद्देश्य राम या कृष्ण की उपासना के बजाय उनके जीवन से संबंधित कई महत्वपूर्ण पक्षों का काव्यात्मक रुप प्रस्तुत करना था।

'जफरनामा’ नामक ग्रंथ गुरुजी की फारसी नज्म है। इसमें फारसी में 140 शेर लिखे हैं। इसे पढ़कर औरंगजेब गुरुजी से प्रभावित हुआ था, और उनसे मिलने को चल पड़ा था। लेकिन मार्ग में बीमार पड़कर मर गया। इसलिए उसे गुरुजी के दर्शन नहीं हो पाये।

'चंडी दी वार’ गुरुजी का पंजाबी भाषा में वीर रस का काव्य ग्रंथ है। इसे पढ़कर योद्धाओं में जोशवर्द्धन हो उठता था। भक्ति और शक्ति के समायोजन की श्रंखला की कड़ी इसे माना जाये तो बेहतर होगा।

'विचित्र नाटक’ नामक गुरु गोविन्द सिंह जी की काव्यात्मक आत्मकथा है। भारतीय इतिहास में बीते काल में कई महापुरुषों को भगवान मान लेने की गलतफहमी के कारण उन्होंने अपने भक्तों को इस ग्रंथ में सचेत भी किया है, वे कहते हैं-
'जो मोहे परमेसर उचरहिं ते सभ नरक कुन्ड में परहैं।
मैं हूं परमपुरख को दासा, देखन आयो जगत तमासा।।’

गुरु गोविन्द सिंह द्वारा रचित सभी काव्य ग्रंथों को संयुक्त रुप से एक ही साथ संकलनबद्ध किया गया है। इस प्रकार तैयार इस विशाल ग्रंथ को 'दशमग्रंथ’ नाम दिया गया है।

-जी.एस. चाहल.