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गन्ने का भाव तक घोषित नहीं, गन्ना समाप्त होने को

गन्ने का भाव तक घोषित नहीं, गन्ना समाप्त होने को

भूखे-प्यासे किसान कलेक्ट्रेट में धरने पर, नेता चुनावों में मस्त

पिछले सीजन का बकाया गन्ना भुगतान और चालू सीजन के गन्ना मूल्य घोषित किये जाने के लिए किसानों को जिला मुख्यालय पर धरना देने को मजबूर होना पड़ रहा है।

यूपीए सरकार को किसान विरोधी कहकर किसानों से बेदखल कर सत्ता पाने वाली मोदी सरकार और किसानों की मसीहा होने का दम भरने वाली सूबे की सपा सरकार गन्ने का बकाया तो क्या सीजन के आखिर आने तक गन्ने का मूल्य तक घोषित नहीं कर पायीं।

किसान-पस्त-और-नेता-मस्त

मिलों ने किसानों का अरबों रुपयों का गन्ना खरीदकर चीनी बना ली और किसानों को यह भी बताने तक को तैयार नहीं कि उसका भाव क्या होगा?

जानबूझकर भुगतान लटकाने को सरकार और मिल मालिक भाव घोषित नहीं कर पा रहे। केद्र राज्य सरकार और राज्य सरकार केन्द्र पर दायित्व डालकर अपना-अपना पल्ला झाड़ रहे हैं।

उधर भूखा-प्यासा किसान अपने खून पसीने की कमाई के माल की कीमत के लिए अधिकारियों के दरवाजों पर पड़ा है। अमरोहा से लखनऊ और लखनऊ से दिल्ली तक सारे नेता और सरकारें अंधे, बहरे, गूंगे और लूले-लंगड़े हो गये हैं।

भूखा-प्यासा किसान-अपने-खून-पसीने-की-कमाई-के-माल-की-कीमत-के-लिए-अधिकारियों-के-दरवाजों-पर-पड़ा

डीएम समेत सभी बड़े अधिकारी कलेक्ट्रेट से नदारद हैं लेकिन किसान इस बार आरपार के मूड में हैं.

किसानों के दूसरे उत्पाद जैसे आलू और उनसे पहले धान और कपास भाड़े के भाव बिके। अच्छा उत्पादन करो तो कोई पूछता नहीं और फसल हल्की रह जाये तो महंगा होने पर भी कुछ बचता नहीं। उलटे शहरी एनजीओ गले में सब्जियों की माला लटकाकर महंगायी का शोर मचाने लगते हैं।

भारतीय किसान यूनियन के नेतृत्व में यह धरना प्रदर्शन चल रहा है। डीएम समेत सभी बड़े अधिकारी कलेक्ट्रेट से नदारद हैं लेकिन किसान इस बार आरपार के मूड में हैं। वे अपनी उपेक्षा से बहुत आहत हैं।

सारे दल चुनावी अखाड़ों में व्यस्त हैं। उन्हें किसानों से कोई सरोकार नहीं।

चाहें भाजपा, सपा, बसपा, कांग्रेस या कोई भी दल हो उनका साथ देने को तैयार नहीं। रालोद नेता जरुर किसानों के साथ दिखाई दे रहे हैं।

-गजरौला टाइम्स डॉट कॉम के लिए एम.एस. चाहल.