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जातीय भंवर में फंसे किसान कैसे बनायें अपनी सरकार?

राष्ट्रीय किसान मजदूर संगठन के नेता सरदार वीएम सिंह

राष्ट्रीय किसान मजदूर संगठन ने पूर्व प्रधानमंत्री चौ. चरण सिंह के जन्मदिवस पर दिल्ली में गुजरे 23 दिसम्बर को किसान पार्टी के गठन की घोषणा कर नयी राजनैतिक पार्टी गठित कर उत्तर प्रदेश विधानसभा के आगामी चुनाव में कूदने की तैयारी शुरु कर दी है। इस संगठन के नेता सरदार वीएम सिंह ने तर्क दिया है कि किसानों के हितों को किसान बिरादरी के नेता ही पूरा कर सकते हैं। इसलिए वे किसानों की पार्टी बना रहे हैं।

इसमें कोई संदेह नहीं कि स. वीएम सिंह लंबे समय से किसानों की बहुत सी दिक्कतें अदालतों में मुकदमे लड़कर दूर कवाने में सफल रहे जबकि कुछ मामलों में कोर्ट के आदेश के बाद भी उन्हें राजनेताओं ने सफल नहीं होने दिया। गन्ना बकाया भुगतान इस बात का सबसे ठोस सबूत है।

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अदालती आदेश के बावजूद राज्य या केन्द्र सरकारें गन्ने का भुगतान नहीं दिला पायीं। बल्कि इस बार तो अभी तक गन्ना मूल्य तक निर्धारित नहीं हो पाया। यह मिल मालिकों और सरकारों की सांठगांठ का प्रत्यक्ष प्रमाण है। दोनों किसानों के खिलाफ हैं, वे चाहते हैं गन्ना मूल्य तय करने में ज्यादा से ज्यादा विलम्ब किया जाये। जब मूल्य ही तय नहीं होगा तो भुगतान की बात ही नहीं।

पहले किसान मूल्य के लिए लड़ेगा, फिर भुगतान की लड़ाई शुरु होगी। तबतक किसान हिम्मत हार चुकेगा, जो मिलेगा लेने को मजबूर होगा।

जातीय भंवर में फंसे किसान कैसे बनायें अपनी सरकार?

लड़ते-लड़ते वीएम सिंह भी थक गये लगते हैं। वे कानूनी लड़ाई जीतने के बाद भी सरकार से हार गये हैं, तो सोच रहे हैं कि किसानों की सरकार बनेगी तो तभी वे सफल होंगे। परन्तु वे जैसा मानकर चल रहे हैं, खेल उतना आसान नहीं, बल्कि बहुत ही कठिन है।

यदि वीएम सिंह सोच रहे हैं कि उन्होंने निस्वार्थ भाव से किसानों की जो लंबे समय तक सेवा की है, किसान उनपर भरोसा करके एकजुट होंगे और जाति-पांति तथा भाई-भतीजावाद को एक ओर रख उनके आहवान पर किसानों की पार्टी को चुनाव में वोट कर देंगे, तो वे हकीकत से कोसों दूर हैं।

प्राचीन इतिहास को छोड़िये, आजाद भारत के सात दशक के घटनाक्रमों पर सरसरी नजर डालें, तो पूरे उत्तरी भारत में बार-बार किसानों से वोट मांगे जाते रहे हैं। संसद और विधासभाओं में बैठे अधिकांश प्रतिनिधि ग्रामीण परिवेश और कृषक समुदायों से संबंध रखते हैं। इससे भी मजेदार बात है कि संसद और विधानसभा में पहुंचते ही हर नेता किसान का बेटा हो जाता है। जबकि पूरे कार्यकाल में ऐसे लोगों में से अधिकांश किसानों को भूल जाते हैं।

किसानों की सबसे बड़ी समस्या यह है कि चुनाव के समय वह बार-बार आजमाये नेताओं के बहकावे में आकर फिर से जाति, वर्ण और क्षेत्रीयता के आधार पर मतदान करने के भंवर में फंस जाता है।

यदि किसान जाति या सम्प्रदाय को दरकिनार कर अच्छे लोगों की पहचान करने में सक्षम हो जाये तो संसद और विधानसभाओं में वीएम सिंह और उनकी विचारधारा के किसान हितैषी नुमाइंदे पहुंच सकते हैं।

बड़ा सवाल यही है, क्या वीएम सिंह किसानों को जाति-पांति की सोच से बाहर निकालने में सफल हो गये हैं?

मैं समझता हूं कि यह बीमारी आजकल पहले से भी गहरी पैठ बना चुकी है। किसान चौतरफा परेशानियों से घिरा है फिर भी अपनी असली कमजोरी को जानते हुए भी उससे निजात पाने का प्रयास नहीं करना चाहता।

वी एम सिंह समझ रहे होंगे कि चौ. चरण सिंह के नाम पर किसान उनके साथ हो जायेंगे। यह धारणा के बल पर उनकी ही नहीं बल्कि भारतीय किसान यूनियन और रालोद का हर नेता अपने को चौधरी का उपासक तक बताते नहीं थकता, फिर भी बीते चुनावों इन दोनों दलों के उम्मीदवारों का जो हश्र हुआ वह सबके सामने है।

चौ. चरण सिंह का बेटा और पोता दोनों को ही किसानों ने नकार दिया।

वीएम सिंह द्वारा नवगठित किसान पार्टी तभी सफल हो सकती है जब उत्तर प्रदेश का किसान, जाट, गुर्जर, सैनी, अगड़ा, पिछड़ा, दलित और मुस्लिम आदि कहलाने के बजाय स्वयं को केवल किसान बिरादरी मान ले। ऐसा होने के आसार नहीं, इसलिए किसान पार्टी की सफलता संदिग्ध ही नहीं बल्कि मेरी राय में असंभव है।

-हरमिंदर सिंह.