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उनकी एक ही गलती है कि वे नेता नहीं, किसान हैं

उनकी एक ही गलती है कि वे नेता नहीं, किसान हैं

पर्यावरण की सुरक्षा के नाम पर जनता के धन को बड़े लोग (यानि पद और पैसे के लिहाज से बड़े लोग) बुरी तरह बरबाद कर रहे हैं और इसी के साथ ऐसे कार्यों का प्रचार करने पर भी खूब धन खर्च किया जा रहा है। फिर भी पर्यावरण सुरक्षा का कोई प्रबंध नहीं हो रहा।

नव वर्ष के आगमन पर ब्रजघाट पर नमामि गंगा योजना के तहत गंगा की स्वच्छता और पर्यावरण सुरक्षा के लिए शुभारंभ हेतु केन्द्रीय मंत्री उमा भारती आयीं। दो हजार करोड़ की इस योजना की घोषणा मात्र करना था। कार्य होने की संभावना तो यहां किसी को नहीं थी। हुआ भी यही हफ्ताभर बाद ही मीडिया में खबर आयी कि गंगा स्वच्छता अभियान उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश में अब नहीं चलेगा। यह आदेश एनजीटी के हवाले से था।

इस कार्यक्रम के दौरान पर्यावरण सुरक्षा के नाम पर उमा भारती ने एक पौधा भी लगाया। इस पौधाारोपण में मौजूद मंत्री उनके सहायक अधिकारी, स्थानीय अधिकारी और तमाम पुलिस बल तो मौजूद रहा ही। इसी के साथ भाजपा के कई वरिष्ठ नेता तथा स्थानीय गणमान्य भी मौजूद थे। सैकड़ों वाहनों में हजारों रुपयों का ईंधन फूंका गया।

रोपा गया पौधा बचेगा भी या नहीं, या कबतक पर्यावरण की सुरक्षा में सहयोग देगा? कहा नहीं जा सकता लेकिन उसके लगाने में ही उमा भारती के मंत्रालय का खर्च लाखों तक पहुंच गया। पौधारोपण में शामिल भीड़ ने वहां आते-जाते वन विभाग के सैकड़ों रोपे गये पौधे भी बरबाद कर दिये। प्रदूषण इतना फैला दिया कि रोपा गया पेड़ उतना प्रदूषण उम्र भर में भी नहीं रोक पायेगा।

बिना किसी तामझाम और प्रचार के पर्यावरण के रखवाले इस वर्ग के लोगों का प्रयास कम लागत और इस तरह के नेताओं से कहीं अधिक है लेकिन उनकी चर्चा नहीं होती

सैकड़ों सरकारी अधिकारियों की गाड़ियां वहां तक आने जाने में ही लाखों का ईंधन खर्च कर गयीं। पेड़ जरुर लगा लेकिन वह जीवित बचेगा या नहीं बाद में उसे कोई देखने भी नहीं आयेगा।

केन्द्रीय मंत्री ने सरकारी नौकरों द्वारा रोपे पौधे को हाथ लगाकर दूसरे हाथ में खुरपा लेकर फोटो खिंचवाई। अखबारों में पौधारोपण की खबर छपी, प्रचार हुआ। मंत्री ने वाहवाही लूटी।

दूसरी ओर किसान हर वर्ष अपने खेतों में वृक्षारोपण करता है। पर्यावरण की सुरक्षा तो वे भी करते हैं। बिना किसी तामझाम और प्रचार के पर्यावरण के रखवाले इस वर्ग के लोगों का प्रयास कम लागत और इस तरह के नेताओं से कहीं अधिक है लेकिन उनकी चर्चा नहीं होती। उनकी एक ही गलती है कि वे नेता नहीं, किसान हैं।

-जी.एस. चाहल.