मन्दिर-मस्जिद विवाद में सियासी ताकत की तलाश : गांव-गरीब की बदहाली दरकिनार

उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव अगले साल होने हैं। भारतीय जनता पार्टी सबसे बड़ी आबादी के इस राज्य में जहां अपनी सरकार बनाने की तैयारी में लग रही है, वहीं सूबे की सत्ता पर बैठी समाजवादी पार्टी अपनी सत्ता फिर से कायम करने को ऐड़ी चोटी का जोर लगाती दिख रही है।

इन दोनों के साथ ही बहुजन समाज पार्टी सुप्रीमो पांचवी बार राज्य की मुख्यमंत्री बनने को लालायित हैं। कांग्रेस और रालोद जैसे दल भी अपनी जड़ें बचाये रखने का प्रयास कर रहे हैं। दूसरी ओर इस कृषि प्रधान राज्य का किसान लगातार बदहाल होता जा रहा है। नेताओं को सत्ता तक पहुंचाने या सत्ता से उतार फेंकने की ताकत रखने वाले इस तबके की सुध न तो केन्द्र की भाजपा सरकार को है और न ही सूबे की सपा सरकार को।

राम मंदिर मुद्दे को बार-बार उठाने से खुद को नहीं रोक पा रहे स्वामी

ऐसे में 2017 के सत्ता समर में सफलता के लिए सियासी जमात अजीबो गरीब मुद्दे तलाश कर जनता की मूल समस्याओं से उसका ध्यान हटाने के मौके तलाश रही है। फिर से गरमाया जा रहा बाबरी मस्जिद बनाम राम मंदिर मुद्दा उसी की एक कड़ी है।

कितनी मजेदार बात है कि केन्द्र और सूबा सरकार दोनों ही गांव, गरीब और किसानों की हमदर्दी का नाटक करते नहीं थक रहीं। जबकि ये तबके आजकल सबसे बुरे दौर से गुजर रहे हैं। दोनों सरकारें इन्हीं वर्गों की तरक्की और बेहतरी के लिए काम करने के दावे कर रही हैं।

बड़े उद्योग का रुप ले चुके टीवी चैनलों और अखबारों के मालिकों की तिजोरियां भरने के लिए आयेदनि इस तरह के विज्ञापनों के बहाने करोड़ों रुपये जनता की कमाई से पानी की तरह बहाये जा रहे हैं।

जमीन पर कुछ करने के बजाय ढोल बजाकर प्रदर्शन का ही अधिक काम हो रहा है। इसी के साथ केन्द्र, राज्य सरकार पर और राज्य सरकार केन्द्र के सिर नाकामियों का ठीकरा फोड़ रही है।

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गांव-गरीब की बदहाली दरकिनार

किसान और गांव के आम आदमी की आय का प्रभाव निकटवर्ती शहरों के व्यापार और कारोबार पर पड़ता है। उसकी जेब हल्की होते ही सारा बाजार मंदी की चपेट में आ जाता है। मांग गिरते ही कारोबारी उद्योगों के उत्पादों को खरीदना बंद कर देते हैं। इस प्रकार श्रंखलाबद्ध हमारी अर्थव्यवस्था की गति मंद पड़ जाती है।

उपभोक्ता माल की मांग ग्रामीण भारत में गांव से चलती है। किसानों की आर्थिक बदहाली का प्रभाव पूरे देश खासकर औद्योगिक उत्पादों पर पड़ता है। केन्द्र की मोदी सरकार के मौजूदा अर्थवेत्ता और सलाहकार, लगता है देश की इस अनिवार्य अर्थनीति को या तो जानते नहीं या जानबूझकर इस देश का बेड़ गर्क करने पर तुले हैं।

बार-बार उद्योगों के बढ़ावे की बात हो रही है। जबकि पहले से लगे उद्योगों का माल बिक नहीं रहा। वे लगातार मंदी की मार का रोना रो रहे हैं।

भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी तथा उनकी पार्टी के कई नेताओं ने प्रदेश के आम आदमी की मूल समस्याओं से ध्यान हटाने के लिए फिर से राम मंदिर का राग छेड़ दिया है। दिल्ली और बिहार की करारी हार के बाद उसे उत्तर प्रदेश में फिर राम की याद आयी है।

उधर सपा भी इसी मुद्दे पर अल्पसंख्यक कार्ड की तैयारी कर रही है। लोकसभा चुनाव में भाजपा ने यहां रिकॉर्ड सीटें हिन्दू ध्रुवीकरण के बल पर ही जीती थीं। वह इस बार और भी गंभीरता से इसी हथियार का सहारा लेने की ओर बढ़ रही है।

भाजपा हो या सपा दोनों ही साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण के प्रयास में लगती दिख रही हैं लेकिन इस बार सूबे की जनता आर्थिक पहलू पर गंभीर है। वह मंदिर-मस्जिद के बजाय रोजी-रोटी को बचाये रखने की सोच रही है। मन्दिर-मस्जिद विवाद से वह दूर रहना चाहती है।

-जी.एस. चाहल.