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सबको समान रोजगार मिलने का अधिकार मिले

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आजाद भारत में जनता की सेवा करने के नाम पर जितनी भी सरकारें आयीं उन्होंने जनता को यह दिखाने का भरपूर प्रयास किया कि उन्होंने जनता को बहुत कुछ दिया जबकि सभी ने अंग्रेजों के बताये रास्ते पर चलते हुए यहां की जनता को जमकर लूटा है। उन्हें ठीक से रोजगार नहीं दिया। यह क्रम आज भी जारी है। इस लूट से परेशान जनता कई बार सरकारों को बदल चुकी लेकिन सभी सरकारें घूम फिर कर अंग्रेजी हुकूमत के पुराने ढर्रे पर चल पड़ती है। हालांकि वह दिखावे के तौर पर जनता को कुछ नये राग छेड़कर एक कुशल ‘मदारी’ की तरह उसमें उलझाये रखती है।

हर सरकार सरकारी बाबूगीरी और अफसरशाही को ठीक करने का दावा करती है लेकिन बाद में उसी की गोद में बैठ जाती है। मौजूदा केन्द्र की सत्ता में जनता ने बड़ी उम्मीद से भेजी मोदी सरकार भी यही कह रही थी कि वह ‘न खायेंगे, न खाने देंगे’। परंतु उन्होंने सौ दिन पूरे होते ही अपने नौकरों को सात प्रतिशत महंगायी भत्ता किश्त का तोहफा देकर चारा डाल दिया। जब महंगायी घटी है तो महंगायी भत्ता घटना चाहिए, बढ़ाने का क्या तुक है? वैसे भी सरकारी सेवाओं में पहले ही वेतन और भत्ते बहुत हैं।

एक ओर देश में ऐसे लोगों की भारी संख्या है जिनकी पूरी युवा अवस्था बेरोजगारी में गुजर गयी और दूसरी ओर भारी भरकम वेतन के साथ तमाम सुविधायें भोगने वाले कुछ लोगों को कभी भत्ते या अन्य सुविधाओं के नाम पर सरकारें जनता का पैसा खुले हाथों से लुटाये जा रही हैं। ऐसे सरकारी कर्मचारी सुविधा शुल्क भी लेने से बाज नहीं आते, सरकारी कार्यालयों में व्याप्त भ्रष्टाचार ऐसे ही लोगों के कारण है। सरकारें आती जाती हैं लेकिन इनके कार्य व्यवहार में कोई अंतर नहीं आया।

development and employment

सरकारी अधिकारी और कर्मचारी सरकारों के हाथ-पांव होते हैं। कोई भी सरकार इनके खिलाफ नहीं जाना चाहती। यही कारण है कि आजादी के साढ़े छह दशक बाद सरकारी कार्यालयों में भ्रष्टाचार कम होने के बजाय बढ़ा है। सरकारी कर्मचारियों के वेतन और भत्ते बहुत बढ़ गये हैं। यदि सरकार इससे आधे वेतन पर भी रिक्तियां निकाल दे तो नवयुवकों की भीड़ लग जायेगी लेकिन यहां आज भी अंग्रेजी नियमों पर सरकारें चल रही हैं।

कई पढ़े-लिखे बेरोजगारों का कहना है कि सभी नवयवुकों को रोजगार उनकी योग्यता के आधार पर दिया जाना चाहिए। यह कहां का न्याय है कि एक व्यक्ति को आजीवन वेतन मिलता है जबकि उतने ही पढ़े-लिखे दूसरे व्यक्ति को सरकार एक दिन भी काम नहीं देती। नियम यह होना चाहिए कि सभी पढ़े-लिखे लोगों को काम दिया जाना चाहिए। इसके लिए भले ही नौकरी पर लगे लोगों को समय पूर्व अर्थात् पचास वर्ष तक सेवानिवृत्त कर देना चाहिए। जो लोग दूसरे लोगों के बेरोजगार रहते इससे अधिक समय तक नौकरी करते हैं वे दूसरों का हक मार रहे हैं। इस तरह का संसद में तबतक कानून बना रहना चाहिए जबतक सब को रोजगार नहीं मिल जाता।

बढ़ती आबादी पर यदि सरकार नियंत्रण कर ले तो इस तरह की समस्या के साथ कई अन्य समस्यायें भी आसानी से काबू हो सकती हैं। यदि हम आबादी को इसी तरह बढ़ने देंगे तो हमारे सामने जो दिक्कतें हैं वे और विकराल हो जायेंगे और हम लाख कोशिशों के बावजूद उनपर काबू नहीं पा सकेंगे। ऐसे में नयी सरकार को सबसे पहले आबादी को काबू करने पर ध्यान देना चाहिए। वैसे इस ओर सरकार का बिल्कुल भी ध्यान नहीं है।

बढ़ती आबादी पर रोक, सरकारी खर्च में कटौती, भ्रष्टाचार पर लगाम और सबको रोजगार में अवसर ये तीन सूत्र हैं जो इस देश का विकास कर सकते हैं। क्या मोदी सरकार ने सौ दिनों में अभी तक इनमें से किसी भी फार्मूले पर विचार किया है? शायद नहीं।

-जी.एस. चाहल

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