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सत्ता की भूख में बिखरती भाकियू : किसानों की एकता को हरपाल बेचैन

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स्व. महेन्द्र सिंह टिकैत के नेतृत्व में भाकियू के झंडे के नीचे चले किसान आंदोलन को इतना बड़ा जनसमर्थन मिला था कि उसकी चर्चा दुनिया भर में हुई थी। मेरठ की एतिहासिक रैली और धरना में इतनी भीड़ इकट्ठा हो गयी थी कि आजतक किसी भी राजनैतिक या अराजनैतिक रैली में भी इतने लोग नहीं जमा हुए। मुजफ्फरनगर के नईमा कांड तथा दिल्ली के बोट क्लब धरने के दौरान भी लोग चौ. टिकैत के एक इशारे पर ही भागे चले आये थे।

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ठेठ देहाती तथा आम किसान की शैली के इस किसान नेता का किसानों पर जो जादू चला था उसे इस नेता के बेटों की राजनैतिक भूख और हठधर्मिता ने टिकैत के स्वर्गवास के बाद धराशायी कर दिया। जिससे एक मजबूत किसान संगठन समय के थपेड़ों से अल्पकाल में ही बिखरकर बेजान सा हो गया। जैसाकि चौधरी टिकैत ने इसे अराजनैतिक बनाये रखा, उसके विपरीत केवल नरेश के बेटे ही नहीं बल्कि उनके चापलूस और स्वार्थी साथियों ने राजनीति के सहारे अपने उल्लू सीधा करने का मार्ग अपनाना शुरु कर दिया।

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भाकियू के रामपुर जिलाध्यक्ष हबीब अहमद तथा राष्ट्रीय उपाध्यक्ष विजयपाल सिंह ने जिला पंचायत के चुनावों में हिस्सा लिया। नरेश टिकैत और राकेश टिकैत ने भी विधानसभा और लोकसभा चुनावों में किसानों से पूछे बिना ही भाग लिया।

इन सभी को तो पराजय का सामना करना ही पड़ा, बल्कि इससे भाकियू संगठन पर बुरा प्रभाव पड़ा। जोया के करतार सिंह तथा रामपुर के हबीब की टिकैत की मौत के बाद हुई मौतों ने संगठन को और भी कमजोर कर दिया था।

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सरदार वीएम सिंह का राष्ट्रीय किसान मजदूर संघ, भाकियू भानु, हरपाल सिंह के भाकियू असली नाम से भाकियू के समानान्तर कई आये संगठन भी खड़े हो गये। कई पदलोलुप ऐसे लोग भी इन संगठनों में घुस गये, जिनका किसान हितों के बजाय स्वप्रचार का मंच प्राप्त करना प्रधान उद्देश्य था।

विभिन्न घटकों में बंटे किसान संगठनों में आंतरिक वैमनस्य भी जड़ें जमाता रहा। जिसके कारण किसान विरोधी ताकतें किसानों के बिखराव को भांप उनकी अनदेखी करने लगीं। उसी का खामियाजा आज किसानों के साथ किसानों के नेता भी उठाने को मजबूर हैं।

यदि अब भी वीएम सिंह, टिकैत बंधु, भानु गुट और हरपाल सिंह एक साथ होकर संघर्ष करें तो, जो भी सरकार आयेगी वह किसानों की उपेक्षा करने का साहस नहीं जुटा पायेगी।

-जी.एस. चाहल.