अंधविश्वास के साये में विकास की तलाश

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सभी लोग अपने भविष्य की जिज्ञासा के साथ जीते हैं। वे आज जिस स्थिति में जी रहे हैं, भविष्य में उससे बेहतर स्थिति के आकांक्षी तो होते ही हैं, साथ ही इसमें बदलाव की तलाश में भी रहते हैं। अपने दुख दर्दों और समस्याओं से छुटकारा पाना हर कोई चाहता है। धूप-छांव की तरह जीवन भर सुख-दुख का खेल भी चलता रहता है। लोग सुख,शांति तथा समृद्धि के लिए कई तरह के उपाय तलाशते हैं। कुछ चीजें प्रयास और समय के बदलाव के साथ बदलती रहती हैं।

हममें से बहुत से लोग भविष्यवक्ताओं, ज्योतिषियों तथा पोंगा पंथियों की शरण लेते हैं। जैसे-जैसे साल बीतता है और नव वर्ष का आगमन होता है टीवी चैनल तथा समाचार-पत्र नये साल की भविष्यवाणियां शुरु कर देते हैं। टीवी चैनलों पर इस तरह के तत्वों की भरमार है। नये साल पर करें? क्या न करें? क्या खायें? क्या न खायें? किस रंग के वस्त्र पहनें? किस रंग के न पहनें? क्या दान करें? किसे दान करें?

सफलता और मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए दुनिया भर के उपाय इनके पास हैं। एक लाल किताब वाले महाशय तो आपके घट-घट के ज्ञाता होने का दावा कर रहे हैं। उनकी किताब कई हजार में बिक रही है। किताब खरीदने वालों का कुछ भला हो या न हो, इन महाशय का काम ठीक चल निकला है।

कहते हैं शिक्षा अज्ञान का नाश करती है लेकिन यहां तो शिक्षित लोग भी भारी संख्या में इन पोंगा-पंथियों की ठगी का शिकार हो रहे हैं। कोई बिना टूटी बांह को गले में लटकाकर फिल्म का प्रचार करने दर्शकों के सामने पहुंच रहा है।

यह टोटका करने वालों को देश की जनता देखने को बेताब है। ये लोग दूसरों को कार से कुचलकर मारने के बाद भी अदालतों से निर्दोष सिद्ध हो जाते हैं और गरीब टोटका कराने पर भी बरबाद से आबाद नहीं होता।

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सन 2016 के आगमन पर इस तरह का धंधा करने वालों का धंधा खूब फलफूल रहा है। किसी के लिए नया साल शुभ हो या न हो, लेकिन ऐसे लोगों के लिए यह साल बहुत ही शुभ घड़ी पर शुरु हुआ है।

टीवी चैनल और हमारे मीडिया के विद्वान, लेखक और पत्रकार इस गोरखधंधे को प्रोत्साहन देने में अपना भरपूर सहयोग दे रहे हैं। जैसे-जैसे शिक्षा का प्रसार बढ़ा है। अंधविश्वास का गोरखधंधा भी उसी गति से बढ़ा है।

यह हाल है हमारे देश के शिक्षित समाज का। नये साल में भी इस दिशा में किसी नये की उम्मीद नहीं।

-जी.एस. चाहल.

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