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ब्लॉक प्रमुख चुनाव उत्तर प्रदेश : चौथे खंभे की खामोशी खतरनाक

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उत्तर प्रदेश के ब्लॉक प्रमुख चुनावों में जो रवैया सत्ताधारी दल समाजवादी पार्टी के नेताओं ने अपनाया उसे लोकतंत्र पर खुला हमला कहना किसी भी तरह गलत नहीं होगा। कुर्सी हथियाने को धनबल, बाहुबल और शासकबल का खुलकर इस्तेमाल किया गया। पुलिस और प्रशासन ने नियम और कानून को ताक पर रखकर सत्ताधारी नेताओं के बंधुआ मजदूरों की भूमिका निभाई। यह और भी शर्मनाक रहा कि निर्वाचन कार्य में संलग्न कर्मचारी और अधिकारी आंख मूंद कर बैठ गये। उन्होंने सत्ता पक्ष की मनमानी को मौन समर्थन दिया। मीडिया में भी इस बाबत उस तरह नहीं लिखा गया जिसकी लोकतंत्र उनसे उम्मीद करता है।

सत्ता, पुलिस, प्रशासन, बाहुबल और राज्य के निर्वाचन तंत्र ने मिलकर जिस प्रकार त्रिस्तरीय पंचायत के अंतिम चरण को संपन्न कराया वह भारत जैसे लोकतांत्रिक देश के लिए किसी भी तरह उचित नहीं हो सकता। अन्याय के शिकार विपक्षी उम्मीदवारों की शिकायतों पर गंभीरता से विचार कर निर्वाचन आयोग को निष्पक्ष निर्णय लेना चाहिए। अन्यथा आगे चलकर दूसरे दल भी लोकतंत्र को इसी तरह कुचलने का प्रयास करेंगे।

अमरोहा जनपद में सपा के दबाव में पुलिस प्रशासन ने विपक्षी उम्मीदवारों को नामांकन स्थल तक भी नहीं जाने दिया। हसनपुर में बसपा समर्थित उम्मीदवार का सही पर्चा भी रद्द कर दिया।

भाजपा नेताओं ने कहीं भी विरोध तक नहीं किया। जबकि ये लोग अपने सबसे अधिक कार्यकर्ता होने के दावे करते हैं। कहां चले गये चीनी कम्यूनिस्ट पार्टी से अधिक सदस्यों वाली पार्टी के सदस्य?

इस तरह तो लोकतंत्र नहीं बचेगा। खबरी चैनलों ने अपने समचारों में चुनावी प्रक्रिया की हकीकत नहीं दर्शायी।

इलेक्ट्रोनिक मीडिया दिल्ली के केजरीवाल सरकार की मामूली त्रुटियों पर भी मुखर हो उठता है लेकिन उत्तर प्रदेश के ब्लॉक प्रमुख चुनाव की हकीकत वह पूरी तरह पचा गया। लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की यह खामोशी लोकतंत्र के लिए और भी खतरनाक है।

-गजरौला टाइम्स डॉट कॉम के लिए हमिंदर सिंह.