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भाजपा की जाट विरोधी नीतियों के चलते जाट आंदोलन भड़का

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जाट आरक्षण का मुद्दा इस बार विशाल आंदोलन के रुप में उभरेगा। उस का मूल कारण यह है कि जाटों की समझ में आना शुरु हो गया है कि जिस भाजपा का अंध समर्थन कर उन्होंने केन्द्र की सत्ता तक पहुंचाया, वह जाट समुदाय को बरबादी में धकेलने वाली सिद्ध हुई।

हरियाणा का तो आम जाट इसे अच्छी तरह समझ गया जबकि उत्तर प्रदेश, राजस्थान और दूसरे राज्यों के भी अधिकांश जाट उसे पहचान गये और थोड़े अभी आंख मूंदे बैठे हैं। देर-सबेर उन्हें भी हकीकत का पता लग जायेगा। दिल्ली तथा पंजाब के जाट पहले ही समझ चुके।

भाजपा की मंशा को समझदार लोग उसी समय भांप गये थे जब केन्द्र के मोदी मंत्रीमंडल में जाटों को उनके योगदान से बहुत कम महत्व दिया गया। मामूली बात पर आयेदिन भाजपा का विरोध करने वाली मामूली पार्टी शिवसेना को भी हमसे अधिक महत्व दिया गया।


हरियाणा में विधानसभा चुनाव से पूर्व ही भाजपा ने खुला ऐलान कर दिया था कि गैर जाट मुख्यमंत्री होना चाहिए। यहां लगातार तीन बार जाट मुख्यमंत्री रहा है। हरियाणा के बहुत से जाट फिर भी भाजपा से चिपके रहे और भाजपा की सरकार बनवाकर ही माने।

गैर जाट मुख्यमंत्री बनाकर भाजपा ने जाट विरोधी होने का पुख्ता प्रमाण दिया। केन्द्र और हरियाणा दोनों सेवाओं से जाट आरक्षण भाजपा के आते ही खत्म हो गया। बहाना बनाया गया कि अदालती फैसला है; सरकार क्या करे?

हम अच्छी तरह जानते हैं, मुलायम सिंह यादव और मायावती के खिलाफ भी मामले हैं, लेकिन फाइलें बंद हैं। तमिलनाडु की मुख्यमंत्री के खिलाफ चलने वाला मामला सरकार बदलते ही उन्हें जेल से रिहा करा देता है।

भाजपा अध्यक्ष अमित शाह भी सरकार केन्द्र में बनते ही पिछले मामलों से बरी हो जाते हैं। उत्तर प्रदेश के एक मंत्री पर दर्जनों केस मायावती समर्थन मिलते ही समाप्त करा देती हैं। इस तरह के उदाहरण भरे पड़े हैं।


इसी से पता चल जाता है कि जाट आरक्षण चाहें केन्द्र में समाप्त किया गया हो या हरियाणा राज्य में उसके लिए दोनों जगह की भाजपा सरकार उत्तरदायी है।

जाट आंदोलन भाजपा नेताओं के बहकावे में आकर बंद होने वाला नहीं। इसकी चिंगारी पश्चिमी उत्तर प्रदेश तक पहुंच गयी है। यदि सरकार ने जाटों की मांग मानने में लापरवाही बरती और टालने का प्रयास किया तो यह विकराल रुप ले सकता है।

पंजाब, हरियाणा, दिल्ली और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में वैसे तो सभी जातियों के लोग ग्रामांचलों में खेती करते हैं, लेकिन इन राज्यों में वास्तविक किसान जाट ही माना जाता है। यहां की खेती प्रत्यक्ष रुप में साठ फीसदी अकेले जाटों के हिस्से में आती है।

सैनी और गुर्जर भी जाटों के बाद ही इस पेशे में आते हैं। कृषि क्षेत्र की भाजपा सरकार द्वारा आते ही जो उपेक्षा की गयी है उसका सबसे अधिक बुरा प्रभाव भी जाट समुदाय पर ही पड़ा है।

गद्दी पर बैठते ही भाजपा ने कांग्रेस सरकार के 2013 के भूमि अधिग्रहण बिल को समाप्त कर जिस नये भूमि बिल का प्रयास किया जा रहा था, उसका खामियाजा भी जाटों को ही सबसे ज्यादा भुगतना पड़ता। दिल्ली से अमृतसर तक, हरियाणा में फरीदाबाद-गुड़गांव से मुख्य शहरों तक तथा दिल्ली से लखनऊ तक तथा राष्ट्रीय राजमार्गों के आसपास, सबसे अधिक भूमि जाट समुदाय की है। नये भूमि अध्यादेश का मूल मकसद भी हमारी भूमि मनमाफिक मूल्य पर हड़पना था। भला हो विपक्षी दलों, खासकर कांग्रेस का, जोकि इसके खिलाफ डट कर खड़े हो गये। हमें फसल बीमा का जो झुनझुना थमाया जाने का प्रयास हो रहा है, उससे किसानों के बजाय बीमा कंपनियों को लाभ कमाने का खुला मौका मिलेगा।

हरियाणा और उत्तर प्रदेश के कद्दावर जाट नेता, आरक्षण के लिए जाट एकता के प्रयास में जुट गये हैं। उनका कहना है कि या तो सभी जातियों के आरक्षण रद्द करो अन्यथा जाटों को मिला आरक्षण भी लागू करो।

यह केन्द्र तथा हरियाणा की भाजपा सरकारों को देखना है कि वह इस सिलसिले में कितनी जल्दी कदम उठाती है। देर से लिया निर्णय सरकार की मुश्किलें बढ़ायेगा। सरकार को पिछले जाट आंदोलनों से शिक्षा लेनी चाहिए। इसी के साथ आसन्न उत्तर प्रदेश और पंजाब विधानसभा चुनावों के परिणामों पर जाट आंदोलन के प्रभाव को भी गंभीरता से लेना चाहिए।

-जी.एस. चाहल.