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किसान की मजबूरी को न अखिलेश समझ रहे, न नरेन्द्र मोदी

किसान-की-मजबूरी

किसानों की गिनी हुई मांगे हैं। उन्हें पूरा करने के लिए किसान को धरना-प्रदर्शन करने को मजबूर होना पड़ रहा है। किसानों का कहना है कि गन्ना मूल्य नहीं बढ़ाया गया है। पिछले कई साल से वही मूल्य है। क्या सरकार किसानों के साथ ऐसा करके कोई पुरानी दुश्मनी निकाल रही है?

किसान हाइवे पर मजबूर होकर गये हैं। जब उन्हें लगा कि कहीं सुनवाई नहीं हो रही। आश्वासन और आश्वासन रोज मिलते रहे। मगर हल तो निकला चाहिए था। हल नहीं निकला। किसान को हाथ लगी सिर्फ मायूसी।

भारतीय किसान यूनियन ने पहले ही कहा था कि वह एक फरवरी को चक्का जाम कर देगी। वह अपनी आवाज कानों में तेल डाले बैठी सरकारों तक पहुंचाना चाहती है। चाहें नरेन्द्र मोदी की सरकार हो या उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव की सरकार, दोनों ने ही किसानों की सुनवाई नहीं की।

वादे तो पीएम मोदी ने भी बड़े-बड़े किये थे, लेकिन हुआ कुछ नहीं। वादे तो अखिलेश यादव रोज कर रहे हैं। किसानों की भलाई के लिए उनकी सरकार जिस तरह योजनायें चला रही है और जिस तरह वे किसानों तक पहुंच रही हैं, हर किसी को पता है।

दरअसल किसानों की तरफ कोई सरकार नहीं देखना चाहती। वह उन्हें उसी तरह रहने देना चाहती है।

किसान कह रहे हैं कि चार साल में हर चीज महंगी हो गयी है, लेकिन गन्ने का दाम वहीं रखा गया है। यह किसानों के साथ नाइंसाफी नहीं तो क्या है?

इसमें किसान की बात नाजायज कैसे हुई? गन्ने की वह खेती करता है। उसका मूल्य उसे उचित ही मिलना चाहिए। वह विरोध करता है तो सरकारें बेचैनी की बात करती हैं।

सरकारों को एक बात भूलनी नहीं चाहिए कि किसान सरकार बना सकता है, तो सरकार गिराने की क्षमता भी रखता है।

किसान गुस्से में बैठा है। उत्तर प्रदेश में चुनावी माहौल गर्मा रहा है। चुनावी वादों की हकीकत को वह समझ चुका है।

-गजरौला टाइम्स डॉट कॉम के लिए मोहित सिंह.