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राष्ट्रीय कृषि विकास योजना का कड़वा सच : चुपचाप बन्द कर दिया सरकारी अनुदान

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किसानों के हित का ढिंढोरा पीटकर कृषि विकास के नाम पर चल रही योजनाओं को इस प्रकार कांट-छांट कर तैयार किया जा रहा है, जो नाम से तो किसानों के विकास की हों लेकिन उनकी आड़ में किसानों को मिलने वाली सभी छूटों को चुपचाप समाप्त किया जा सके।

उत्तर प्रदेश में तो इसपर अमल भी शुरु हो गया है तथा गन्ना उत्पादकों की गर्दन पर धीरे से मीठी छुरी चलनी शुरु हो चुकी है।

कई प्रकार की सरकारी सब्सिडी तत्काल प्रभाव से बंद कर दी गयी है और चुपके-चुपके सभी सरकारी सहायता बंद करने का काम चल रहा है।

भोला किसान खामोश बैठा है, क्योंकि मीठी छुरी के दर्द से ध्यान बटाने के लिए प्रधानमंत्री तथा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के कई मुंहलगे मंत्री अपने-अपने नेताओं को गांव, गरीब और किसान हितैषी होने का बखान करते फिर रहे हैं।

राष्ट्रीय कृषि विकास योजना के तहत मिलने वाली सहूलियतों पर बिना बताये चुपचाप रोक लगा दी गयी है। बेहतर कृषि प्रदर्शन के लिए मिलने वाली साढ़े सात हजार की राशि हो या कृषि यंत्रों पर मिलने वाला अनुदान हो, सभी पर रोक लगा दी गयी है। कल्टीवेटर, हैरो तथा रोटावेटर सहित कई कृषि यंत्रों पर पचास फीसदी किसानों को मिलता था। यह चुपचाप बंद कर दिया गया है। इस साल इन यंत्रों की खरीद पर किसानों को अनुदान नहीं दिया जा रहा।

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जो किसान उन्नत कृषि के कारण अधिक उत्पादन करते थे, ऐसे किसानों को हर साल साढ़े सात हजार प्रति किसान के हिसाब से प्रोत्साहन राशि मिलती थी, यह अब बंद कर दी। इसलिए इस बार किसी भी किसान को यह धन नहीं दिया जा रहा।

गन्ना शोध केन्द्र का बीज उगाने वाले किसानों को प्रति कुन्टल सौ रुपये के अनुदान का प्राविधान है। इस साल से यह भी बंद कर दिया गया है। जिन्होंने गत वर्ष इस तरह से गन्ना बीज अपने खेतों में उगाया है, उन्हें इस साल यह अनुदान भी नहीं दिया जा रहा। प्रत्येक जिले के लगभग तीन-तीन सौ किसान इस योजना में भाग लेते थे। इन सभी को अब मायूसी का सामना करना पड़ेगा। इससे सरकार का किसानों के साथ बड़ा छल करने की मंशा का पता चलता है। ऐसे में यह कहने में बुराई नहीं कि सूबा और केन्द्र सरकार दोनों ही किसानों की सभी सहूलियतें खत्म करने का मन बना चुकीं।

दोनों सरकारें एक हाथ से किसानों की पीठ थपथपा रही हैं तथा दूसरे हाथ से गर्दन पर मीठी छुरी फेरकर उसे खत्म करने पर तुली हैं। अखिलेश सरकार किसान वर्ष घोषित कर तथा मोदी सरकार फसल बीमा का झुनझुना दिखाकर किसान हितैषी होने का ढोंग कर रही हैं।

सरकारी रवैया नहीं बदला तो किसानों को रोक नहीं पायेगी सरकार

सरकारी उपेक्षाओं से त्रस्त किसानों में आक्रोश पनपना शुरु हो गया है। गन्ना किसानों ने उसकी शुरुआत उत्तर प्रदेश में कर दी है। किसानों के किसी भी आंदोलन को ताकत के बल पर कुछ समय को धीमा किया जा सकता है, लेकिन रोका नहीं जा सकता। उत्तर प्रदेश समेत कई राज्यों में चुनाव सिर पर हैं। इसलिए सरकारों को किसानों से किया छल महंगा सिद्ध हो सकता है। इतिहास गवाह है कि देश के सभी बड़े आंदोलन किसानों के सहारे सफल हुए हैं।

-जी.एस. चाहल.