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बढ़ती जनसंख्या : विकास को निगलता आबादी का अजगर

बढ़ती-जनसंख्या

बढ़ती जनसंख्या और घटते रोजगार वर्षाें से देश के विकास में बाधक तो हैं ही, साथ ही इनके कारण हमारे सामने कई नयी-नयी समस्यायें उत्पन्न हो रही हैं। भ्रष्टाचार, अपराध तथा लोकतांत्रिक मूल्यों का ह्रास भी इसी बीमारी के संक्रमण का परिणाम है।

कोई सरकार कितना भी प्रयास करले आबादी पर विराम के बिना किसी भी समस्या का निदान संभव नहीं। सरकारी सेवाओं में घुसने के लिए लोग तरह-तरह के अवैध तरीके अपनाते रहे हैं। बेरोजगारों की हर क्षण बढ़ती कतार ने नवयुवकों को निराशा तथा आक्रोश से भर दिया है। ऐसे में वे लोग भी आरक्षण की मांग करने को मजबूर हो गये हैं, जो कल तक इससे अछूते थे।

यदि देश में रोजगार सृजन का दायरा तेजी से बढ़ाया जाये तो आरक्षण व्यवस्था अपने आप ही समाप्त हो जायेगी। हर हाथ में काम होगा, तब हर समस्या का समाधान हो जायेगा।

यह कहना भी न्याय संगत नहीं कि रोजगार सृजन को पिछली सरकारें बिल्कुल उदासीन रहीं। पीछे मुड़कर देखें तो देश में हर क्षेत्र में रोजगार के अवसर बेतहाशा बढ़े हैं। परंतु जिस देश में आजादी को बच्चे पैदा करने की आजादी मान लिया गया हो, वहां सीमित संसाधनों से क्या होगा?

अंग्रेज एक बिल्कुल लुटा-पिटा और दरिद्र देश छोड़कर गये। जहां खाने को अनाज तक नहीं पैदा होता था। कई गुना आबादी बढ़ने के बावजूद वही देश आज खाद्यान्न निर्यात कर दूसरे देशों की भूख भगाने में सक्षम है।

लोहे का हल तक बाहर से मंगाने वाला देश पम्पिंग सैट, ट्रैक्टर तथा कई भारी-भरकम मशीनी सामान दूसरे देशों को भेज रहा है। स्वनिर्मित उपग्रह हम मंगल ग्रह पर भेजने में सफल रहे हैं। स्कूल कालेजों की भरमार होती जा रही है। सड़कों पर चार दशक पूर्व गांव के लोग किसी कार का दर्शन घंटों प्रतीक्षा के बाद करते थे लेकिन आज इस प्रतीक्षा में रहते हैं कि सड़कों पर कारों और बसों की लंबी लाइनें कब टूटें ताकि सड़क के उस पार जाया जा सके।

विकास का बहुत लंबा सफर हम तय कर चुके। लेकिन यह समावेशी विकास नहीं है। भले ही हर वर्ग का जीवन स्तर सुधरा है लेकिन अमीर और अमीर तथा गरीब उससे लगातार पीछे छूटता गया है। इसके पीछे भी बढ़ती आबादी एक बड़ा कारण है।

वोटों की राजनीति आबादी पर विराम में सबसे बड़ी बाधा है। सरकारें इस बाधा को हटाने का संकल्प लेकर इस दिशा पर विराम लगायें तो कई समस्यायें एक साथ समाप्त होंगी।

क्या मौजूदा केन्द्र सरकार इस बारे में सोच भी सकती है? ऐसा कोई संकेत नहीं है। बल्कि यह तो इस दिशा में पिछली सभी सरकारों से भी दो कदम आगे है।

सरकार में भगवा मंडली के कई ऐसे चेहरे जिन्होंने एक भी बच्चा पैदा नहीं किया, देशवासियों को अधिक बच्चे उत्पन्न करने को उकसा रहे हैं। इसी से पता चल रहा है कि मौजूदा सरकार देश को किस दिशा में ले जा रही है? बढ़ती आबादी हमारी बरबादी का मूल है। इसे रोकिये।

-जी.एस. चाहल.