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चुनावों में बहुत याद आये रविदास

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मध्यकालीन भारत की संत श्रंखला के महान संत रविदास जी के जन्म दिवस पर हमारे देश के नेता उनकी भक्ति पूजा में कुछ अधिक ही तल्लीन हए जा रहे हैं। उत्तर प्रदेश में होने जा रहे विधानसभा चुनावों की आहट ने कई ऐसे नेताओं को भी संतजी का जन्मदिवस मनाने को मजबूर कर दिया, जो उनका नाम लेने से भी अपवित्र हो जाते थे। ऐसे लोग दिल्ली से चलकर काशी उनके मंदिर में नतमस्तक हो रहे हैं जबकि दिल्ली में भी संत रविदास का विशाल मंदिर है जहां उनका जन्मदिवस बहुत ही धूमधाम से मनाया जाता है। रविदास जी के नये भक्तों में हमारे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी शामिल हो गये हैं।

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दरअसल उत्तर प्रदेश में दलित मतदाता विशाल वोट बैंक है। विधानसभा चुनावों में मायावती को वह चार बार मुख्यमंत्री बनाने में सफल रहा है और बीते लोकसभा चुनावों में उसने भाजपा का समर्थन कर बाकी सभी दलों का सूपड़ा साफ करा दिया था। रविदास जी से पहले हमारे नेताओं को भीमराव अंबेडकर के जन्मदिन पर बहुत याद आये थे। चुनाव के मौके पर हमारे सभी दलों को डा. अम्बेडकर और संत रविदास से महान कोई नेता या संत नजर नहीं आते। चुनावों के जाने और अगले चुनाव आने तक हमारे नेताओं के लिए ऐसे महापुरुष बीते इतिहास की बात हो जाते हैं।

संत-रविदास

संत रविदास जिन्होंने डा. भीमराव अंबेडकर से भी कई सदी पूर्व हमारे देश में सामाजिक रुढ़िवाद और धार्मिक आडंबर के खिलाफ आंदोलन चलाया था और अंधभक्तिवाद से अलग हटकर एकेश्वरवाद की अलख जगायी, हमारे दलित चिंतकों तथा दलित नेताओं के उतने श्रद्धा पात्र नहीं बन पाये जितने डा. अंबेडकर को बनाया गया। जबकि उनका स्थान मध्यकालीन की समाज सुधारक संतों में विशिष्ट स्थान रखता है।

डा. अंबेडकर के समय तथा संत रविदास के समय में धरती-आकाश का अंतर है। मध्यकालीन भारत का युग धार्मिक और सामाजिक मामलों में बेहद भेदभावपूर्ण था। ब्राह्मणवादी व्यवस्था दलित समाज के लोगों को छूना तक दूर उनकी छाया से भी परहेज करने वाली थी। जातीय आधार पर जर्बदस्त भेदभाव था। दलितों को सामाजिक जीवन में कई मानवीय अधिकारों से वंचित किया जा रहा था। ऐसे विकट समय में महान ईश्वर भक्त रविदास जी ने जिस पवित्र मानवीय मूल्यों के प्रति दृढ़ता और प्रेम भावना का परिचय दिया उसका उदाहरण इतिहास में कम ही दिखाई देता है।

काशी जैसे धार्मिक नगर में जब पाखंडी और धर्मान्ध पुजारियों का एकछत्र कब्जा हो चुका था तब रविदास जैसे अकेले संत ने वहां ईश्वरीय ज्ञान की ज्योति जलाने का काम किया। बड़े-बड़े ज्ञानी और विद्वान जिनमें ईश्वर अमृत की पिपासा थी, वे संत रविदास के शिष्य बनकर स्वयं को धन्य मान रहे थे। एक दलित के शिष्य बनने के लिए क्षत्रिय, ब्राह्मण और राजे महाराजे लालायित हो उठे। मेवाड़ के राज परिवार की वधु मीराबाई जैसी कृष्ण भक्त भी रविदास जी के चरणों में नतमस्तक होग गयी। महान गुरु को एक महान शिष्या मिल गयी थी।

रविदास जी का विशाल भक्ति साहित्य है जो देश के मौजूदा हालात में सामाजिक समरसता, मानव मूल्यों, ईश्वर भक्ति तथा राष्ट्रीय प्रगति के लिए रविदास जी के भक्ति साहित्य को बच्चों से बड़ों तक पहुंचाने की जरुरत है। यह काम अम्बेडकरवादियों को सबसे पहले करना चाहिए।

अंत में रविदास जी की अमृतवाणी की दो पंक्तियां -

'बहुत जनम बिछुरे थे माधव, यह जन्म तुम्हारे लेखे।

कह रविदास, आसलग जीवां चिरभयो दरसन देखे।।’

-जी.एस. चाहल.