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ब्लॉग : चुनाव और होली का त्यौहार

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आज के समय में यह बहुत ही जरूरी है कि हम चुनाव और होली के त्यौहार की समताओं और विषमताओं पर विचार करें.

अतः चर्चा प्रस्तुत करता हूँ. अनुरोध है आप विचार अवश्य करियेगा  :-

होली में दोस्तों, पड़ोसियों, रिश्तेदारों, मिलने-जुलने वालों को गीला या सूखा रँग लगाते हैं. उन्हें पकवान खिलाते हैं हँसते बोलते हैं.

चुनाव में विरोधियों पर काली रोशनाई, कीचड़, गन्दगी जो वैचारिक और सूक्ष्म या स्थूल जो वास्तविक भौतिक स्वरुप में होती है डालते हैं. काले झण्डे दिखाते हैं. गाली गलौच, मारपीट करते हैं और उनपर निराधार के गंदे आरोप लगाते हैं व चरित्रहनन करते हैं.

होली में हम होलिका दहन करते हैं जो अच्छाइयों की बुराईयों पर जीत के रूप में मनाई जाती है.

चुनाव में हम विरोधियों का पुतला फूँकते हैँ. दंगे करते या करवाते हैं. विरोधियों का घर जलाते हैं.

अच्छी बात यह है कि चुनाव के दौरान अपने प्रचार में जहाँ लोग अपनी तारीफ करते हैं, विरोधी की गलतियाँ जगजाहिर करतें हैं और यदि हम थोड़ा बुद्धि और विवेक का प्रयोग करें तो नीर क्षीर करना कोई बड़ी बात नहीं.

अतः जहाँ होली सदभावना का त्यौहार है. चुनाव द्वेष, ईर्ष्या, हिंसा का त्यौहार है. तो क्या इसका मतलब यह है कि हम चुनाव में भाग न लें?

नहीं मेरी इस चर्चा का तात्पर्य यह बिलकुल नहीं है. वास्तव में चुनाव हमारे किसी भी राष्ट्रीय पर्व से कम महत्व का नहीं है. यह हमें हमारे गणतन्त्र द्वारा प्रदत्त एक बड़ा अधिकार है और हमारा यह पावन कर्तव्य है कि हम इसका प्रयोग अपनी बुद्धि और विवेक का प्रयोग करके करें.

केवल उन्हें ही चुने जो निस्वार्थ इस देश की सेवा करना चाहतें हैं. जो ईमानदार हैं, योग्य हैं और अपराधिक पृष्ठिभूमि से नहीं हैं.

अतः हर नागरिक जो मताधिकार के योग्य है द्वारा अपना मताधिकार का प्रयोग करना उसकी मौलिक आवश्यकता, नैतिक जिम्मेदारी एवं उसकी देश भक्ति की परीक्षा भी है.

यदि हम अपने देश में अपराध मुक्त, ईमानदार, देशभक्त जनप्रितिनिधि चाहते हैं और यह चाहते हैं कि वे देश की जनता के लिये हितकर काम करे तो अच्छे और सही जनप्रितिनिधि चुने.

-गजरौला टाइम्स डॉट कॉम के लिए अखिलेश चन्द्र श्रीवास्तव.