Header Ads

विदेश नीति की चूक से नेपाल तक पहुंचा चीन

nepal-china-india-policy

भारत के सीमावर्ती देशों से जहां भारत के सम्बंधों में शिथिलता आयी है, वहीं चीन की नजदीकियां इन देशों से बढ़ती जा रही हैं। दूसरे शब्दों में इन देशों में चीनी घुसपैठ दो वर्षों में तेजी से बढ़ी है। हाल ही में अपनी जरुरतों के लिए भारत पर निर्भर रहने वाले एकमात्र हिन्दू राष्ट्र नेपाल ने चीन के साथ परंपरागत संधि के तहत दस महत्वपूर्ण समझौते किये हैं। समझौते लागू होते ही चीनी पहुंच नेपाल से सटी भारतीय सीमा तक हो जायेगी। इससे हमें नेपाली सीमा पर भी पाकिस्तान और बांग्लादेश की सीमा की तरह अतिरिक्त सुरक्षा बढ़ानी पड़ेगी। भले ही चीन यह दावा कर रहा है कि इसका प्रभाव भारत-नेपाल संबंधों पर नहीं पड़ेगा।

सदियों से भारत-नेपाल के रिश्ते बहुत ही प्रगाढ़ और खुले रहे हैं। इन रिश्तों में पहली बार खटास पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के कार्यकाल में तब आयी थी, जब उन्होंने एक नौसिखिये राजनीतिज्ञ की तरह नेपाल को निर्यात किये जाने वाले सामानों पर पाबन्दी लगा दी थी। बाद में बहुत प्रयासों के बाद हालात सामान्य हो पाये थे।

इस बार प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने नेपाल की यात्रा के दौरान दोनों देशों के पुराने संबंधों को और मजबूती प्रदान करने का भरोसा दिलाया था। परन्तु उसके थोड़े समय बाद ही वहां की सरकार की नाकामी के चलते मधेसी आंदोलन जोर पकड़ गया। वहां के कई नेताओं ने इसका दोष भारत पर भी मंढने का प्रयास किया। आंदोलनकारियों ने भारत से सप्लाई होने वाले जरुरी सामान को अंदर नहीं जाने दिया। आंदोलन लंबा खिंचने से आम जरुरत की चीजों की कीमतें वहां आम आदमी की पहुंच से दूर हो गयीं। इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि वहां की हालत क्या हो गयी होगी।

अनाज, दवाईयां, गैस, तेल, चीनी आदि तमाम सामग्री भारत से ही वहां जाती है। यहां के बंदरगाहों तथा सड़क मार्गों पर ही पूरे नेपाल की सप्लाई और आयात-निर्यात निर्भर है। देश के सड़क परिवहन का अधिकांश कार्य भारत के निजि ट्रांसपोर्टरों के हाथ में है।

चीन तिब्बत पर कब्जा जमाये बैठा है। वह लंबे समय से इस कोशिश में है कि यदि नेपाल तक वह पहुंच जाये तो भारत के इस पड़ोसी देश के सहारे वह अपनी कूटनीति को बेहतर संचालित कर सकता है।

पाक अधिकृत कश्मीर के सहारे वह पश्चिमी छोर पर हम तक आ चुका। अरुणाचल की सीमा से वह पहले ही मिला हुआ है। लंका में वह बंदरगाह का निर्माण कर चुका। अब तिब्बत से नेपाल तक रेल लाइन बिछाने का चीन-नेपाल समझौता भारतीय बंदरगाहों पर नेपाल की निर्भरता कम करने का प्रयास है। जिन दस समझौतों पर दोनों देशों में सहमति बनी है, उसमें नेपाल में ढांचागत सुविधायें भी चीन मुहैया करायेगा। यानि निकट भविष्य में धीरे-धीरे नेपाल भारत पर अपनी निर्भरता समाप्त करने में सक्षम हो जायेगा। हमारे विदेश नीति विशेषज्ञ बेहतर जानते होंगे कि वैश्विक व्यापार के मौसम में यह समझौता हमारे सामरिक और व्यापारिक हितों पर गहरी चोट होगा।

चीन भले ही दावा करे कि इससे नेपाल-भारत संबंधों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। हम जानते हैं कि हमारे तथा नेपाल के संबंध तो प्रभावित होंगे ही साथ ही चीनी संबंधों पर भी हमें अब आत्ममंथन की जरुरत है। हमने इस नाजुक वक्त में मामूली कूटनीतिक चूक की तो हमारा सदियों पुराना पड़ोसी देश भी हमें आंखें दिखाने से नहीं चूकेगा। हमारी विदेश नीति समीक्षा मांगती है।

-जी.एस. चाहल.