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झुमके के चक्कर में किसानों को भूली सरकार

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पिछले दिनों बरेली में भाजपा की ओर से किसान कल्याण रैली का आयोजन किया गया था। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी मुख्य अतिथि थे। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसानों को रैली में ले जाने की भाजपा नेताओं ने तैयारी के लिए कई दिनों तक गांवों में भाग-दौड़ की, फिर भी वांछित परिणाम नहीं मिले। रैली किसानों का कल्याण करने के नाम पर थी, फिर भी प्रधानमंत्री ने किसानों की तसल्ली की कोई बात नहीं की बल्कि हर बार की तरह वे अपने मन की ही बात करते रहे। इसी दरम्यान पता नहीं किसी ने उन्हें याद दिलाया या खुद उन्हें ही उमंग उठी।

सन 1966 में बनी फिल्म 'मेरा साया’ में आशा भोंसले के गाये गीत -'बरेली के बाजार में झुमका गिरा रे’ उन्हें याद आ गया। किसान कल्याण के बजाय वे उस झुमके की चर्चा कर बैठे, जो कहीं गिरा ही नहीं था, बल्कि फिल्म के नायक सुनील दत्त और नायिका साधना पर फिल्माये गीत को गढ़ने में शामिल किया गया था। इस गीत के झुमके के बिना अस्तित्वहीन हो। झुमके और सुरमे की चर्चा के बीच फंसे प्रधानमंत्री किसानों को निराश करके चलते बने।

प्रधानमंत्री के जाने के बाद किसान उन्हें रैली में लाने वाले नेताओं को लताड़ते हुए वापस चले गये जबकि बरेली विकास प्राधिकरण ने साढ़े छह करोड़ रुपये का प्रबंध कर एक चौराहे पर इस धन से चौदह फीट चौड़े झुमके की प्रतिकृति लगाने की योजना को मंजूरी दे दी।

कितनी मजेदार बात है कि कई-कई सौ किलोमीटर चलकर हजारों किसान गन्ने का बकाया और फसलों के उचित मूल्य की उम्मीद में बरेली पहुंचे और किसान कल्याण रैली करने वाले 'झुमका कल्याण रैली’ के आगे समर्पण कर बैठे।

किसानों का माल खरीदकर उसकी कीमत चुकाने के नाम पर सरकार या मिल वालों के पास पैसे नहीं जबकि फिल्मी गाने की याद से ही साढ़े छह करोड़ तुरंत निकल पड़े।

-जी.एस. चाहल.