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सिमट चुका किसानों का सह-धंधा पशुपालन

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पिछले दो वर्षों में किसान सबसे अधिक परेशान रहा है। कृषि उत्पादन में गिरावट के आंकड़े भी यही बयान कर रहे हैं। ऐसे में किसान पशु पालन को सहायक धंधे के रुप में अपनाता रहा है। दुग्ध व्यवसाय उसके आड़े वक्त में काम आया है। परन्तु इन दो वर्षों के बीच किसान को लाभ पहुंचाने वाले इस धंधे ने भी उसे आबाद के बजाय बरबाद करने की भूमिका ही निभायी है।

राज्य में अवैध पशु वध तथा अवैध मांस कारोबार ने गांव के किसान और ऐसे भूमिहीन वर्ग को बरबाद करने में कोई कमी नहीं छोड़ी जो पशु पालन कर आजीविका चला रहे हैं। मुरादाबाद, संभल, रामपुर, अमरोहा से लेकर बिजनौर तक पशु चोरों और लुटेरों का बोलबाला है। ये चोर तथा पशु लुटेरे हमारे नेताओं से भी बड़े धर्मनिरपेक्ष हैं -इन्हें न तो हिन्दू-मुस्लिम भेदभाव करना और न ही अमीर-गरीब में फर्क करना है, जिसके भी पशु हत्थे चढ़ जाते हैं, फिर वापस नहीं मिलने।

घरों या पशु शालाओं में बंधे गाय-भैंस या बकरी कुछ भी हो रात में हथियारों के बल पर जबरन वाहनों में डालकर ले भागने की खबरें आयेदिन अखबारों में छपती हैं।

गरीब पशु पालक ऐसा होने पर अपना सबकुछ लुटाकर बरबाद होते जा रहे हैं। सत्ताधारी सपा नेताओं को इन घटनाओं का अच्छी तरह पता है। पुलिस में भी शिकायतें जाती हैं। ये तो पशुओं का मामला है। यहां तो हत्याओं के बाद भी खुलसा होना बहुत मुश्किल है। केएसके में मृत छात्र का राज न खुलना ताजा उदाहरण है।

गंगा के खादर में, जहां पशुपालन खेती से भी बड़ा व्यवसाय है, लोगों ने पशुपालन से तौबा करनी शुरु कर दी और लोग बड़े शहरों में काम की तलाश में निकलते जा रहे हैं। गांव का किसान और मजदूर वर्ग दोनों ही दुखी हैं। वे सपा से पहले ही दुखी थी, तभी लोकसभा चुनाव में उसे साफ कर दिया था, अब भाजपा से भी कोई लाभ नहीं हुआ तो विधानसभा चुनाव में किसी तीसरे को देखेंगे। वह कौन होगा, यह 2017 का चुनाव परिणाम बतायेगा।

-गजरौला टाइम्स डॉट कॉम के लिए मनुव्वर चौधरी.