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जनता से दूरी का खामियाजा भुगतने को तैयार रहें एम. चन्द्रा

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अमरोहा लोकसभा क्षेत्र के पांचों विधानसभा क्षेत्रों पर समाजवादी पार्टी का कब्जा है। इनमें से चार अमरोहा जनपद और एक हापुड़ जनपद में है। मंडी धनौरा सुरक्षित सीट है। यहां से माइकल चन्द्रा विधायक हैं। उन्होंने पिछले विधानसभा चुनाव में रालोद-कांग्रेस के संयुक्त उम्मीदवार जगराम सिंह को हराकर सपा लहर में मामूली अंतर से विजय पायी थी। भाजपा उम्मीदवार हरपाल सिंह तीसरे नंबर पर पहुंच सके थे। बसपा नामांकन के मौके पर उम्मीदवार बदलने के कारण हारी थी।

सुना जा रहा है कि सपा और भाजपा अपने पुराने उम्मीदवारों को मैदान में उतारेगी। बसपा डा. संजीव लाल को उम्मीदवार घोषित कर चुकी। बसपा ने पहले भी शुरु में डा. लाल को ही मैदान में उतारा था लेकिन नामांकन से थोड़ा पहले ही उसने उम्मीदवार बदल दिया। नया उम्मीदवार आते ही मतदाताओं में फूट पड़ गयी, जिसका खामियाजा बसपा को चुनाव में भुगतना पड़ा। रालोद या कांग्रेस इस बार यहां कोई बेहतर उम्मीदवार चाहते हैं। जब वे एक साथ मिलकर नहीं जीत पाये तो अलग-अलग लड़ने पर कैसे जीत सकते हैं?

विधानसभा सीट के लोगों की जिज्ञासा अगले विधायक के प्रति है, एक दूसरे से पूछ रहे हैं कि कौन होगा नया विधायक? क्या एम. चन्द्रा सीट बचा पायेंगे? यह बड़ा सवाल है लेकिन इसका जबाव अभी धुंधला है।

सपा कार्यकर्ताओं में उनकी छवि एक सीधे-सादे नेता की है। इसी के साथ विपक्षी उन्हें निष्क्रिय विधायक मानते हैं। क्षेत्र में आयोजित विभिन्न समारोहों में सबसे कम आमंत्रित होने वाले नेताओं में वे शीर्ष पर हैं। चुनाव प्रचार में भी वे सबसे कम जनसंपर्क करने वाले उम्मीदवार होने के बावजूद जीतने में सफल रहे।

मंडी धनौरा निवासी वे पहले नेता हैं जो इस पद पर पहुंचे। उनसे पहले सविता रानी सहित कई नेताओं ने विधानसभा में जाने का प्रयास किया लेकिन विफल रहे।

अपने कार्यकाल के चार वर्षों में उनका अधिकांश समय मंडी धनौरा शहर में या लखनऊ में बीता। गजरौला में वे एक-दो बार किसी अपने ही काम या मजबूरी में आ गये हों तो कहा नहीं जा सकता। वैसे चुनाव के बाद उनका वहां से कोई नाता नहीं है। वैसे भी लोग यहां नौगांवा विधायक अशफाक खां को ही बुलाते हैं। वे वैसे भी यहां काफी समय देते हैं। बहुत से लोगों को यही पता है कि उनके विधायक अशफाक खां हैं।

पिछला चुनाव बसपा को हराने के लिए था। इसलिए लोगों ने यह नहीं देखा कि कौन जीत रहा है, बल्कि यह देखा गया था कि बसपा को कौन हरा सकता है। यही कारण था कि एम. चन्द्रा को बिना मांगे ही वोट मिल गये।

इस बार चक्र उल्टा लगता है। आम राय लगती है कि जनता सपा के खिलाफ है। इसलिए जो काम पिछली बार बसपा के साथ हुआ वह इस बार सपा के साथ होने से इंकार नहीं किया जा सकता। यह अलग बात है कि इसके विकल्प के लिए जनता बसपा, भाजपा या कांग्रेस में से किसे पसंद करेगी?

एम. चन्द्रा चुनावी आहट के बावजूद खामोश घर बैठे हैं। उनके बेटे कपिल चन्द्रा को जरुर एक-दो जगह घूमते देखा गया है। उधर कपिल पर एक महिला ने मुकदमा कराया था जिसे कपिल ने बदनाम करने का षड़यंत्र बताया था। फिर भी इससे विधायक को नुकसान तो होगा ही, हालांकि लोग जानते हैं कि एम. चन्द्रा बहुत शरीफ इंसान हैं।

विधायक को ग्रामांचलों के लोग पहचानते तक नहीं और वे जनसंपर्क तक को तैयार नहीं। कई लोग अपनी समस्या फोन पर कहते हैं तो विधायक मंडी धनौरा बुलाते हैं। जबकि कई लोग नाराज होकर कह भी देते हैं कि इससे तो तुम्हें धनौरा का चेयरमेन बनना चाहिए था।

इस बार एम. चन्द्रा के सामने सबसे बड़ी मुसीबत लोगों के बीच न पहुंचने के कारण खड़ी होगी। सत्ता विरोधी लहर और जनता से दूरी बनाये रखना एम. चन्द्रा की सफलता में सबसे बड़े अवरोध हैं? क्या एम. चन्द्रा इन्हें पार करने में सफल होंगे?

-गजरौला टाइम्स डॉट कॉम मंडी धनौरा.