Header Ads

टैक्स तो आम आदमी ही चुकाता है

tax-payer-common-man-india

आम धारणा है कि देश में कर-दाताओं की संख्या कम है। माना जाता है कि आम आदमी कर-मुक्त जीवन जी रहा है। सभी अर्थशास्त्री तथा अर्थ विशेषज्ञ भी समय-समय पर आयोजित परिचरचाओं में खुलकर कहते हैं कि कर दाताओं की संख्या सीमित है। इस पर सामाजिक संगठनों से जुड़े लोग भी अलग राय नहीं रखते। मीडिया पूरी तरह इसी लीक पर चलता है। जबकि हमारा मानना है कि सभी प्रकार के करों और राजस्व का भार आम आदमी को ढोना पड़ता है। जिन्हें करदाता माना जा रहा है, या जो कर अदा करते हुए दिखते हैं, वे अपनी जेब से इस मद में पैसा नहीं देते, बल्कि वे पहले ही आम आदमी से उससे भी अधिक धन ले चुके होते हैं, इसलिए जैसा दिखता है, हकीकत में वैसा होता नहीं।

एक छोटा सा उदाहरण लीजिये, एक मामूली रिक्शा चालक या दैनिक मजदूर जो अपने उपभोक्ता वर्ग में सबसे कम खर्च करता है। वह भी बराबर राजस्व का हर जगह बार-बार भुगतान करता है। मोबाइल फोन खरीदने से लेकर रिचार्ज कराने तक में उसे कर भुगतान करना पड़ता है। कंपनी अपना लाभांश निकालकर उसपर टैक्स जोड़कर उससे वसूल करती है। आम आदमी सुई से लेकर चप्पल और टोपी तक जो भी खरीदता है, उसपर विक्रेता, निर्माता और ट्रांस्पोर्टर तक लाभांश जोड़ते जाते हैं तथा उनके द्वारा जो भी कर अदा किया जाता है वह सारा ग्राहक से लिया जाता है। सारे खर्च तथा राजस्व आदि के बाद भी वह उसमें लाभांश आदि का भुगतान भी देता है।

तमाम दवाईयां, लोहा, सीमेंट, ईंट, चारपाई, खाद्य पदार्थ, टूथपेस्ट और आम जरुरत की चीजों पर नाना प्रकार के कर तथा मंडी शुल्क आदि भी आम उपभोक्ता को चुकाने होते हैं। ऐसे में यह कहना बिल्कुल गलत है कि आम आदमी कर भुगतान नहीं करता।

एक मामूली आदमी जो सबसे कम बिजली खर्च करता है। फिक्स चार्ज उसे उससे दोगुनी या कई गुनी बिजली फूंकने वाले अमीर आदमी के बराबर देना पड़ता है। इसी के साथ कई तरह के कर उसपर लगते हैं।

मोटा वेतन पाने के बाद जिन सरकारी या गैर-सरकारी कर्मचारियों पर आयकर लगता है, तो उसपर क्या फर्क पड़ता है? उसे जिस जहां से पैसा दिया जा रहा है उसमें पहले ही आम आदमी की कमाई का अंश मौजूद होता है।

अथाह संपित्तयों के स्वामी बनते जा रहे फिल्म निर्माता और अभिनेता उस आम आदमी की जेब से पैसे खींचकर यहां तक पहुंचे हैं। लोगों को मनोरंजन कर तक देना पड़ता है। कई अन्य टैक्स आदि जोड़ने के बाद फिल्मों को अथाह कमाई होती है। यह सारा धन शत-प्रतिशत आम आदमी का होता है। इसमें से भी कर देते समय वे बहानेबाजी करते हैं। यानि जो कर आम आदमी से सरकारी खजाने के लिए लिया गया उसे भी ये हड़पना चाहते हैं। साथ ही शोर मचाया जाता है कि फलां हीरो-हीरोईन ने इतने करोड़ टैक्स जमा किया। जैसे कि वह अपने घर से दे रहा हो।

उद्योगपति सारे टैक्स जोड़कर उसके बाद मोटा मुनाफा जोड़कर अपना उत्पाद बेचते हैं। जिसको आम आदमी की जेब से वसूला जाता है। जबकि कहा जाता है कि फलां उद्योगपति ने इतना राजस्व अदा किया।

यह कहने में कुछ भी गलत नहीं कि जिनकी जेब से सभी तरह का राजस्व दिया जाता है, वह दिखता नहीं और जो दूसरों की जेब से पैसा खींचकर उसमें से थोड़ा सा सरकारी खजाने में देते हैं, वे सबको दिखते हैं।

-जी.एस. चाहल.