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कुर्सी पर हो, कहते रहो अपने मन की, चुनावों में हम भी कह देंगे मन की

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किसानों के प्रति केन्द्र सरकार एक बार फिर से हमदर्दी का नाटक करने में जुट गयी है। जैसे-जैसे पंजाब और उत्तर प्रदेश के चुनाव निकट आते जायेंगे वैसे ही वैसे सत्ता और विपक्ष में बैठे नेता किसानों के और भी हमदर्द बनते दिखाई देंगे। पंजाब और उत्तर प्रदेश देश के सबसे बड़े कृषि प्रधान राज्य हैं। यहां किसानों का विशाल वोट बैंक सत्ता का फैसला करेगा। ऐसे में वे सभी दल जो कुरसी मिलते ही किसानों को भूल जाते हैं, अब किसानों के हमदर्द बनने का नाटक करते-करते वोटों के लिए उनके आगे 'मिमयाते' देखे जा सकते हैं।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी किसान कल्याण रैलियां कर रहे हैं। गन्ने तथा आलू के उचित मूल्य के लिए बरबादी पर पहुंच चुके किसानों को उनकी फसलों का उचित मूल्य दिलाने में असमर्थ पीएम अब फसल बीमा के जाल में फंसा कर एक बार फिर उन्हें मूर्ख बनाने का प्रयास कर रहे हैं। किसान भोला जरुर है लेकिन इतना नासमझ नहीं कि वह हर बार बेवकूफ बन जाये।

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किसान जानता है कि दो वर्ष पूर्व चुनाव प्रचार में नरेन्द्र मोदी ने छाती पीट-पीटकर किसानों को फसल लागत का पचास फीसदी लाभ का दावा किया था। वह दावा, सफेद झूठ साबित हुआ। धान, कपास, गेहूं और गन्ना या आलू कोई भी कृषि उत्पाद हो, पचास फीसदी लाभ तो क्या लागत मूल्य पर भी सरकार खरीदने या खरीदवाने को भी तैयार नहीं हुई। बल्कि धान और कपास का मूल्य तो पिछले सरकारों से भी कम कर दिया गया। फसल आने से पहले आलू बेहद महंगा था, किसान की फसल आते ही कीमतें धड़ाम हो गयीं। खेतों से निकलते ही आलू के दाम फिर बढ़ने लगे। गन्ने पर लागत तीन सौ रुपये कुन्टल आती है, मोदी जी ने उसे पचास फीसदी अधिक पर क्यों नहीं बिकवाया।

टैक्स तो आम आदमी ही चुकाता है


केन्द्र सरकार ने तो 250 रुपये भी मूल्य तक नहीं किया। कई कृषि यंत्रों की सब्सिडी भी खत्म कर दी गयी। इस तरह केन्द्र सरकार किसानों का कल्याण कर रही है। किसानों को ऐसा कल्याण नहीं चाहिए।

अब फसल बीमा का प्रचार हो रहा है। इसके जरिये से भी बीमा कम्पिनयों की तिजोरियां भरी जायेंगी। किसान के पास जो दो-चार पैसे आयेंगे वे इस बहाने निकालने का प्रयास किया जा रहा है। किसान सरकार की मंशा समझ रहे है। चुनाव आने दो जैसा कल्याण किसानों का किया जा रहा है। वैसा ही कल्याण करने को किसान भी तैयार हैं। वे भी अपने मन की कह देंगे।

-जी.एस. चाहल.