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गुड़गांव से गुरुग्राम : एक भ्रामक निर्णय

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भाजपा के कई जिम्मेदार नेता भी कई बार अनावश्यक विवाद उत्पन्न करने के काम कर बैठते हैं। हरियाणा की खट्टर सरकार ने जाट आंदोलन से सामान्य हुए राज्य में फिर एक अनावश्यक मामले को तूल दे दिया है। उसने गुड़गांव का गुरुग्राम और पूरे मेवात क्षेत्र का नूह नामकरण कर दिया है। इसके पीछे जो तर्क दिया जा रहा है, वह पूरी तरह बेतुका और निरर्थक है।

कहा जा रहा है कि गुड़गांव महाभारतकालीन युद्ध प्रशिक्षण स्थल है जहां द्रोणाचार्य राजकुमारों को शस्त्र विद्या सिखाते थे। इसी के साथ यह भी कहा जा रहा है कि पौराणिक कथाओं में इसका वर्णन है। पहले इसका नाम गुरुग्राम था, जो बाद में बिगड़कर गुड़गांव हो गया।

सभी जानते हैं कि गन्ने से पुरातनकाल में गुड़ बनना शुरु हुआ था, जो आज भी जारी है। प्राचीनकाल में थोड़ी बहुत खांड देसी विधि से दवाई आदि के लिए बनाई जाती थी। आज की तरह चीनी बनाने का कोई तरीका ईजाद नहीं हुआ था। हरियाणा का गुड़गांव के पास का इलाका गन्ने का खास कृषि इलाका था। उस समय यहां गुड़ बनाने का भी सबसे अधिक काम होता था। इसीलिए लोग इसे गुड़ गांव के नाम पुकारते थे। जो आजतक नहीं बदला।

गुरु से गुड़ या गुड़ से गुरु शब्द का परिवर्तन होेने की बात का कोई तुक ही नहीं। यदि ऐसा हुआ होता तो हरियाणा के लोग आज गुरुओं को भी गुड़ कहते होते। वैसे भी किसी भी पौराणिक ग्रंथ में इस स्थान का किसी भी नाम से कोई जिक्र तक नहीं। गुड़गांव तो एक बड़ा औद्योगिक नगर बनने के बाद चर्चाओं में आया है। इससे पहले यह वास्तव में गुड़ा बनाने या गुड़ की मंडी जैसा ही गांव था। रही बात गांव को ग्राम करने की तो वह एक ही बात है, लेकिन हरियाणा की बोलचाल या स्थानीय भाषा में ग्राम शब्द कहीं नहीं है, यहां गाम या गांव ही बोला जाता है।

हरियाणा की एक प्राचीन कहावत भी है कि यहां कभी भी ब्राह्मणों या देवों का कब्जा नहीं रहा यथा -'हरियाणा की धरती ना बामन की, ना देवन की, कुछ जाटन की कुछ मेवन की।’

जिस धरती पर ब्राह्मणों और देवों को स्थान ही नहीं था, वहां ब्राह्मण द्रोणाचार्य कहां से आ गया?

हरियाणवी सांस्कृतिक पहचान वहां की भाषा और ग्रामीण परिवेश के मूल नामकरण से है। भाजपा यहां से ग्राम, शहर या क्षेत्रीय स्थानों के सांस्कृतिक नाम बदलकर हरियाणवी संस्कृति से छेड़छाड़ करने का प्रयास न करे।

-जी.एस. चाहल.