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औद्योगिक इकाईयों के खिलाफ योजनाबद्ध संघर्ष की तैयारी

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क्षेत्र में बढ़ रही पढ़े-लिखे बेरोजगारों की फौज तथा यहां लगे उद्योगों में ऐसे युवकों को रोजगार न मिलने से यहां तनाव शुरु हो गया है। कुछ युवकों ने संगठित होकर लंबे तथा मजबूत संघर्ष की दिशा में कदम बढ़ा दिये हैं। ये युवक दो मुद्दों पर खासतौर से मुखर हैं जिसमें स्थानीय उद्योगों द्वारा फैलाया जा रहा प्रदूषण बंद कराना और बाहरी लोगों के बजाय स्थानीय लोगों को काम देना शामिल है।

युवा शक्ति का तर्क है तीन दशकों में स्थापित उद्योगों ने यहां की उस कृषि भूमि को किसानों से लिया है जो बेहद उपजाऊ थी। जहां धान, उड़द, अरहर, चना, गन्ना, गेहूं तथा मक्का आदि फसलें लहलहा उठती थीं।

उद्योग स्थानीय लोगों की भूमि पर लगे हैं। यहां के इलाके में वायु और जल प्रदूषण फैल रहा है। भू-गर्भीय जल का बेजा दोहन किया जा रहा है। यहां के लोग, पशु, पक्षी तथा फसलों और पेड़-पौधों तक पर प्रदूषण का कुप्रभाव पड़ रहा है।

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नवयुवकों का कहना है कि हमारा, हमारे प्राकृतिक संसाधनों आदि का दोहन किया जा रहा है। हम बीते तीस वर्षों से सहन कर रहे हैं। सोचा कि इस खामियाजे के बदले हमें रोजगार मिल जाये तो इसे सहन किया जा सकता था। लेकिन रोजगार बाहरी लोगों को मिल रहा है। यहां के जिन नौजवानों ने तीस वर्ष पूर्व रोजगार सृजन के सपने देखे थे, वे अब पचास के पार हो बुढ़ापे की बाहों में सिमटने शुरु हो गये। उसके बाद की पीढ़ियां अब परेशान होकर संघर्ष की राह पर मजबूरीवश निकल पड़ी हैं। उनका कहना है कि अब आर-पार की लड़ाई होगी। या तो उद्योगों में स्थानीय युवकों को रोजगार मिलेगा या औद्योगिक इकाईयों को यहां की वायु और जल को प्रदूषित कराने तक संघर्ष जारी रखेंगे। इस सिलसिले में कई बैठकें शुरु हो चुकीं।

हाल में फैक्ट्री प्रबंधकों से भी युवकों की वार्ता भी हुई है लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला।

-हरमिंदर सिंह चाहल.