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महमदपुर : समाजशास्त्रियों की दलील का दम निकालता सूखा पीड़ित गांव

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कभी ढेंकुली के सहारे भरपूर सब्जियां उगाने वाला गांव महमदपुर आज ट्रैक्टर तथा डीजल पम्पिंग सेट के बल पर भी सफल नहीं हो रहा। ब्लॉक के सबसे बड़े सब्जी उत्पादक गांव के लोग सब्जी उत्पादन से तौबा कर चुके। परिणाम स्वरुप इक्का-दुक्का खेतों में नाम मात्र को भिंडी, करेला तथा मिर्च दिखाई दे रही है।

गजरौला-बिजनौर प्रांतीय राजमार्ग पर मंडी धनौरा से मात्र दो किलोमीटर दूर बसे इस गांव में छोटी जोत के सैनी बिरादरी के लोग बसे हैं। जो प्राचीनकाल से सब्जी उत्पादन के सहारे जीवनयापन करते रहे हैं। सत्तर के दशक में यहां अधिकांश लोग ढेंकुली से सिंचाई करते थे। एक-दो रहट के कुंए भी लगे थे। पूरा जंगल तेज गर्मी के मौसम में हरी-भरी सब्जियों के पौधों और बेलों से आच्छादित दिखाई पड़ता था।

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चार क्या ढाई दशक में धीरे-धीरे भूगर्भीय जल नीचे होता गया जबकि आजकल ट्रैक्टर और डीजल इंजन के जरिये भी सिंचाई मुश्किल है बल्कि बेतहाशा खर्च भी है। जिससे महंगी सब्जी होने के बावजूद औसत नहीं पड़ रहा।

साठ वर्षीय जयपाल और चालीस वर्षीय बाबूराम का कहना है कि उन्होंने खेती से तौबा कर ली है। पानी चलाते-चलाते थक जाते हैं लेकिन फसलों की प्यास नहीं बुझती। एक-दो बीघा काम चलाऊ सब्जी बोकर बाकी खेत में बरसात होने पर धान लगायेंगे।

गांव के अधिकांश लोग आसपास या दूरदराज गांवों में काम कर रहे हैं या काम की तलाश में भटक रहे हैं। कुछ, 'जैसे उड़े जहाज को पंछी पुन जहाज पै आवै’ की तर्ज पर घूम-फिर कर फिर उसी सूखे खेत में हड्डियां धुनने आने को बाध्य होते हैं।

भले ही बेरोजगारी, गरीबी अथवा अभावों के जीवन से यहां के नौजवान वर्षों से जूझ रहे हैं लेकिन इतना सब होते हुए भी यहां किसी भी नौजवान ने अपराध की दुनिया में कदम नहीं रखा। यह गांव समाजशास्त्रियों के उन दावों को झुठलाने में सफल रहा है जो बेरोजगारी, गरीबी और अभावों को अपराधों का जन्मदाता कहते नहीं थकते।

-गजरौला टाइम्स डॉट कॉम मंडी धनौरा.