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सियासी ताकतें और प्रशासन युवाओं के खिलाफ, उद्योगपतियों का साथ देते हैं

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स्थानीय उद्योगों के प्रदूषण के खिलाफ वर्षों से कई बार अनेक लोगों और संगठनों ने आंदोलन तथा प्रदर्शन किये। परंतु न तो प्रदूषण पर विराम लगा और न ही स्थानीय बेरोजगारों को रोजगार की पहली हुई। सवाल उठता है कि किस कारण से ऐसा हुआ?

इसके अनेक कारण हैं। प्रदूषण के खिलाफ जो भी मुहिम छेड़ी गयी, उसका उद्देश्य प्रदूषण मुक्ति के बजाय मुहिम के अगुआ तत्वों के निहित स्वार्थ पूरे करना मात्र था। इनमें अधिकांश लोग इकाईयों में ठेके आदि लेने के लिए प्रबंधतंत्र पर दबाव बनाना चाहते थे। जिसमें सत्ताधारी नेता ही सफल होते रहे, शेष शोर मचाकर शांत होते रहे।

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पूर्व मंत्री स्व. रमाशंकर कौशिक, सांसद देवेन्द्र नागपाल तथा राशिद अल्वी जैसे नेता अपने चहेतों को अपने कार्यकाल में ठेके दिलाते रहे। अब इनके स्थान पर मंत्री कमाल अख्तर, सांसद कंवर सिंह तंवर आदि के लोगों को काम मिला हुआ है।

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कमाल अख्तर जब पहली बार राज्यसभा में पहुंचे थे, तो जुबिलेंट कंपनी में उन्हें सीधी उंगली से अपने चहेतों को काम दिलाने में सफलता नहीं मिली। उन्होंने अपने सैकड़ों समर्थकों के साथ जुबिलेंट के दक्षिणी प्रवेश द्वार पर तोड़फोड़ कराकर शक्ति का अहसास कराया तो उनके करीबी को यहां बड़ा-सा काम मिल गया, जो आज भी जारी है। (जुबिलेंट में तोड़फोड़ की तस्वीरें ऊपर देख सकते हैं)

पिछली बार जब रोहताश शर्मा नगर पंचायत चेयरमेन बने तो उनके परिवार के सदस्य को भी काम मिल गया था। हरपाल सिंह भी इसी तरह से सेवारत हैं। मंडी धनौरा विधायक एम. चन्द्रा का भी कोई न कोई होगा, जो वे भी यहां गेस्ट हाउस में आते-जाते हैं।

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जिले के ऐसे सभी अधिकारी जो इन इकाईयों के खिलाफ कार्रवाई करने की क्षमता रखते हैं। वे बराबर इनके मेहमानीय आवास में समय-समय पर ठहरते रहते हैं। अमरोहा से अधिक समय अधिकारी गजरौला की इकाईयों को देते हैं।

सक्षम जनप्रतिनिधि जिनमें विधायक, सांसद और मंत्री तथा जिलाधिकारी, उप-जिलाधिकारी और पुलिस अधिकारी यहां की औद्योगिक इकाईयों का साथ देते हैं। जब भी यहां के युवा रोजगार पाने या प्रदूषण खत्म कराने के खिलाफ मुखर होते हैं तो जनप्रतिनिधि और प्रशासन औद्योगिक इकाईयों के पक्ष में खड़े होते हैं। युवाओं के सभी प्रयास विफल हो जाते हैं। उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई तक की जाती हैं।

टेवा एपीआई में तो बाउंसर बुलाकर स्थानीय युवाओं की पिटाई भी करायी गयी और कई को बाहर कर दिया गया। उनके पक्ष में न तो कोई नेता, न ही कथित समाजसेवी खड़ा हुआ। पूरा प्रशासन और ताकतवर लोग बेरोजगारों या प्रदूषण पीड़ितों के बजाय औद्योगिक इकाईयों के पक्ष में खड़े हो जाते हैं।

-गजरौला टाइम्स डॉट कॉम गजरौला.