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नौकरियों में रिटायरमेंट आयु घटायी जाये

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उत्तर प्रदेश में विश्वविद्यालयों, सहायता प्राप्त डिग्री कालेजों तथा राजकीय डिग्री कालेजों में पढ़ाने वाले शिक्षकों की रिटायरमेंट आयु 65 वर्ष करने की तैयारी चल रही है। दूसरे कई विभागों में भी रिटायरमेंट आयु बढ़ाने की मांग यदा-कदा उठती रही है। परंतु लगता है, इस बार इस सिलसिले में सरकार गंभीरता से तैयारी कर रही है। जो लोग इन सेवाओं में लगे हैं, वे तो चाहते हैं कि मरते दम तक उन्हें रिटायर न होना पड़े लेकिन जिन्हें पढ़े-लिखे होने के बावजूद 60 या 65 साल तो क्या एक दिन की भी नौकरी नसीब नहीं हुई, सरकार उनके बारे में क्यों नहीं सोच रही?

केवल चन्द लोगों की हर सुविधा पर जनता के खजाने को खर्च करना सामाजिक न्याय नहीं हो सकता।

न्याय संगत तो यह होना चाहिए कि आबादी और सरकारी वैतनिक कार्यों में या तो सभी नागरिकों को उनकी योग्यता अनुसार समान समय तक भागीदारी निश्चित की जाये अथवा जो बेरोजगार हैं उन्हें इतना रुपया प्रतिमाह जरुर दिया जाये, जो उनके रहन-सहन, भोजन-वस्त्र तथा स्वास्थ्य के लिए जरुरी है। यह किसी भी लोकतांत्रिक देश में न्यायसंगत नहीं कि एक व्यक्ति को लाखों का वेतन तथा दूसरी सुविधायें मिल रही हैं जबकि बड़ी आबादी एक-एक पैसे के लिए मजबूर है।

रोटी, कपड़ा और मकान सबको मिलना चाहिए तथा जिन लोगों को सरकारी नौकरी दी जाये उन्हें इसके बाद मामूली वेतन मिलना चाहिए। जबतक सबको रोजगार या नौकरी नहीं मिल पाये तब तक बारी-बारी से दस-दस या 15-15 अथवा जितना देने पर सबको मिल सके उतने-उतने वर्ष की सरकारी नौकरी दी जानी चाहिए।

कुशल या अकुशल एक बहाना है। जो जितना जानता है उसे उसी तरह काम दिया जाना चाहिए। यहां जितने शिक्षित और प्रशिक्षित बेरोजगार हैं उनसे कम पढ़े-लिखे नौकरियां कर रहे हैं। जो लगे हैं, वे योग्य हो गये, जो बेरोजगारी में ही बूढ़े हो गये, वे अयोग्य ठहराये जा रहे हैं।

सबको समान अवसर देने के लिए रिटायरमेंट आयु बढ़ाने के बजाय घटानी होगी। पचास वर्ष से पूर्व रिटायरमेंट होना चाहिए। अथवा सभी को एक न्यूनतम वेतन, जिसमें रोटी, कपड़ा और मकान का खर्च चल सके दिया जाये।

-जी.एस. चाहल.