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फिर स्कूल चलो अभियान

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उत्तर प्रदेश के प्राथमिक और पूर्व माध्यमिक स्कूलों में नया शिक्षा सत्र शुरु होते ही हर वर्ष की तरह अध्यापक बच्चों के साथ गांवों में जुलूस निकालने लगे हैं। यह सभी बच्चों को साक्षर बनाने तथा सरकारी स्कूलों में अधिक से अधिक बच्चे लाने के नाम पर एक औपचारिक कार्यक्रम बन गया है। स्कूल खुलते ही इस औपचारिकता को पूरा किया जाना जरुरी है। इसी के साथ बच्चों संग अध्यापकों का किसी रास्ते में खड़ा करके फोटो खिंचवाना और उसे अखबारों में छपवाना भी जरुरी है। इससे विभागीय अधिकारियों को पता चल जाता है कि उनके अध्यापक वास्तव में जनता में शिक्षा जागरुकता की अलख जगाने का पूरा प्रयास कर रहे हैं। लेकिन उनके स्कूलों में प्रतिवर्ष बच्चों की संख्या बढ़ने के बजाय घट रही है।

यह किसी से छिपा नहीं है कि इन स्कूलों में बच्चे भेजना लोगों में हीन भावना का कारण बनता जा रहा है। यहां बच्चे पढ़ने भेजने वालों को बेचारे तथा बहुत ही निचले स्तर के लोग माना जाता है।

कई परिवारों के बच्चे तो इन स्कूलों में जाते हुए शरमाते हैं। जबकि निजि स्कूलों में भेजने वाला एक मजदूर व्यक्ति भी गर्व से कहता है कि उसका बेटा या बेटी फलां स्कूल में जाता है। हमारा बच्चा अंग्रेजी पढ़ रहा है।

हालांकि कई सरकारी स्कूलों में अध्यापक बहुत मेहनत कर रहे हैं। वे पूरी निष्ठा और ईमानदारी से शिक्षा दे रहे हैं। परंतु लोग यह सुनना भी पसंद नहीं करना चाहते कि उनका बच्चा सरकारी प्राथमिक स्कूल का छात्र है।

अधिकांश लोग अपना पेट काटकर, सभी दूसरे खर्चों में कटौती कर महंगी फीस खर्च कर निजि स्कूलों में भेजना पसंद कर रहे हैं। निजि स्कूलों की हालत बिना जांचे परखे कई अभिभावक जहां जेब कटा रहे हैं, वहीं बच्चों का भविष्य भी नहीं संवर पा रहा।

सरकारी स्कूलों में गिने-चुने स्कूलों को छोड़कर शेष सभी में शिक्षा का बुरा हाल है। दूसरे विभागों को छोड़िये शिक्षा विभाग के अफसरों से लेकर एक चपरासी तक भी अपना बच्चा अपने विभाग के स्कूलों में नहीं भेजता। जनता इतना तो समझती ही है कि जिस स्कूल का टीचर दूसरों से उनके बच्चों को अपने स्कूल में भेजने को कहता है, वह अपने बच्चे वहां नहीं पढ़ाता। इसके पीछे कुछ तो कारण है।

यदि इन स्कूलों का शिक्षा स्तर बेहतर हो तो सबसे पहले इन स्कूलों के अध्यापक और उनके अधिकारी यहां बच्चे भेजेंगे।

पिछले वर्ष कोर्ट ने सरकारी अधिकारियों के बच्चों को सरकारी स्कूलों में भेजने को कहा था, परंतु उससे भी कोई फर्क नहीं पड़ा। इतना जरुर हुआ कि अध्यापक जब शिक्षा जागरुकता रैली निकालते हैं तो कुछ लोग उनसे सवाल कर बैठते हैं कि मास्साब आपके बच्चे किस स्कूल में पढ़ते हैं?

-जी.एस. चाहल.