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छोटे किसानों को त्वरित मदद की दरकार

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देश के तेरह राज्य सूखे की चपेट में हैं। सूखा लंबा खिंचने के आसार हैं। आकाश साफ है। आकाश में आग बरस रही है। मानव के साथ ही पशु-पक्षियों और जंगली जानवरों में हा-हाकार मचा है। बरसात आने में कितना समय लगेगा यह अनुमान ही लगाया जा सकता है। लक्षण मानसून के देर से आने के हैं। ऐसे में जहां सिंचाई के सहारे फसलें उगायी जा रही हैं, उनपर भी संकट से इंकार नहीं किया जा सकता। लगातार गिरते जल स्तर से बोर वैल कम पानी उगल रहे हैं। पानी की मांग बढ़ने और नलकूपों द्वारा पानी कम फेंकने से सिंचाई पूरी नहीं हो पा रही। इसका सबसे बुरा असर सब्जियों की फसलों पर पड़ेगा। बेल वाली सब्जियां, यथा - लौकी, तोरी, करेला, टिंडा और कद्दू का उत्पादन कम हो जायेगा। इनकी कीमतों में इजाफा होगा। किसानों के सामने इससे कम उत्पादन तथा बढ़ती लागत के कारण या आर्थिक संकट उत्पन्न होना शुरु हो गया है।

किसान, गांव और गरीब को बरबादी से बचाने के लिए सरकारी बैंकों के कर्ज से दबे किसानों का ऋण माफ किया जाना जरुरी है.


जहां बिजली के नलकूप के बजाय डीजल इंजन के सहारे खेती की जा रही है, वहां तो बहुत ही बुरा हाल होता जा रहा है। ऐसे किसान जरुर बरबाद होने हैं। पशु पालन कर दूध को सह-कारोबार के तौर पर अपनाने वाले किसान पशुओं को बेचने को मजबूर हैं। हरे-चारे का संकट खतरनाक मोड़ पर है।

किसान, गांव और गरीब को बरबादी से बचाने के लिए सरकारी बैंकों के कर्ज से दबे किसानों का ऋण माफ किया जाना जरुरी है। विशेषकर लघु और सीमान्त किसानों को यह छूट फौरी तौर पर दी जानी चाहिए। यदि ऐसा नहीं किया गया तो देश के कई भागों से किसानों की मौत और आत्महत्याओं की खबरों में तेजी से वृद्धि होगी। उत्तर प्रदेश में आयेदिन कई किसान आत्महत्यायें करने को मजबूर हैं।

दंगे फसाद होने पर इंटरनेट सेवायें बाधित करा दी जाती हैं लेकिन सूखे की दुष्प्रभाव की खबरों को दबाना यहां आसान नहीं होगा। जिस तरह हालात हैं उतनी गंभीर सरकारें नहीं दिख रहीं। हालात खराब होने के ठोस संकेतों पर तो उन्हें स्थिति से निपटने को तैयार हो जाना चाहिए।

-जी.एस.चाहल