Header Ads

UP ELECTION 2017 : सपा और भाजपा से नाराज हैं किसान, मजदूर और दलित

up-election-2017

उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने में एक वर्ष से भी कम समय रह गया है। दूसरे शब्दों में इस चुनाव में इतना समय बाकी है कि चुनाव में भाग लेने वाले दल चुनावी दंगल की तैयारी में जुट गये हैं। जहां सपा अपनी कुर्सी बचाने को अपने सारे दांव चल रही है। वहीं सपा से कुर्सी छीनने के लिए जहां बसपा अकेले ही मैदान में उतरने का एलान कर चुकी, वहीं भाजपा एक-दो सहयोगियों से सांठगांठ में जुट गयी है जबकि कांग्रेस छोटे-छोटे कई दलों का गठजोड़ कर प्रदेश की कुर्सी पाने का प्रयास करने लगी है। मीडिया अपने आकलन में बसपा को मजबूत मानकर सपा, भाजपा और कांग्रेस को पिछड़ता मानने की बात कर रहा है।

यहां कई बार से ऐसा सिलसिला चल रहा है कि सपा और बसपा अदलबदल कर सत्ता में आते रहे हैं। इसी सिलसिले में लोग इस बार फिर से बसपा का अनुमान लगा रहे हैं। भाजपा और कांग्रेस जैसे बड़े राष्ट्रीय दलों के नेतृत्व में से किसी की भी सरकार अभी नहीं बन पाने के पीछे किन कारकों को उत्तरदायी माना जा रहा है? इस सवाल का सटीक उत्तर किसी के पास नहीं।

अकेले दम पर चुनाव लड़ने और सरकार बनाने का भरोसा बसपा सुप्रीमो को हो सकता है। उसके पीछे सबसे बड़ा कारण यह है कि उत्तर प्रदेश में सपा के चार वर्ष के शासन में भ्रष्टाचार बढ़ा है। बेरोजगारों का ग्राफ लगातार ऊपर जा रहा है। किसानों की फसलों का उत्पादन गिरा है, लागत बढ़ी है, जबकि इसके विपरीत कृषि उत्पादों का मूल्य नहीं बढ़ाया गया। पशु चोरी और पशु लूट की घटनाओं ने ऐसे गरीब किसानों की आर्थिक कमर तोड़ कर रख दी, जिन्होंने कम भूमि या बेरोजगारी के कारण पशु पालन को जीविका का साधन बनाया था।

जरुर पढ़ें : प्रशांत किशोर और कांग्रेस की नैया पार लगाने की जुगत


पश्चिमी उत्तर प्रदेश के अधिकांश जिलों में वैध और अवैध तरीकों से पशु मांस का कारोबार जारी है। सपा शासन में इस धंधे की बाढ़ सी आ गयी है। मेरठ और मुरादाबाद मंडल के जनपदों में गांवों में पशु चोरी या लूट कर उन्हें काटकर पशु तस्करों ने जो तांडव मचाया है उससे पशु पालन लोगों ने कम कर दिया है।

इतना बुरा हाल हो गया था कि इस तरह की घटनाओं के बाद अधिकांश मामलों में पुलिस रिपोर्ट तक दर्ज नहीं कर पाती थी। पिछले कुछ समय से चुनाव की आहट ने सपा नेताओं की तन्द्रा भंग की और उन्होंने इस दिशा में प्रशासन को सख्ती का इशारा भी दिया था। इसी का परिणाम है कि अब पशु चोरी और लूट की घटनाओं में कमी आयी है। कुछ भी हो इस अपराध का जनता में जो संदेश पहुंच चुका और जिन गरीबों का जीवन बरबादी के कगार पर पहुंच गया, उसका खामियाजा तो सपा को भुगतना ही होगा।

कृषि, मजदूरी और पशुपालन करने वाले इन लोगों में बहुसंख्यक तो हैं ही लेकिन उस अल्पसंख्यक समुदाय की भी बड़ी तादाद है जिनके रहनुमा बनने और उद्धार करने के ठेकेदार सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव तथा उनका सत्ताभोगी कुनबा बना हुआ है। उपरोक्त तीनों तबकों के मतदाताओं की तादाद सत्तर फीसदी से ऊपर है। इनकी  नाराजी मोल लेकर कोई सत्ता का सपना देख रहा है तो भला वह कैसे सफल हो सकता है?

उधर भाजपा की केन्द्र में सरकार बनवाने में 72 सांसद इसी प्रदेश की देन है। यदि चार वर्षों में अखिलेश यादव और उनका खानदान इस प्रदेश का भला नहीं कर पाया, तो दो वर्षों से इन 72 सांसदों ने तो चुनाव जीतने के बाद, केवल प्रधानमंत्री का गुणगान करने के अलावा अपने क्षेत्रों की सुध तक लेनी गवारा नहीं की। बल्कि प्रधानमंत्री ने सबसे बड़े सत्तापालक कुनबे के मुखिया को सबसे अच्छा नेता कहकर सिद्ध कर दिया कि भाजपा भी सपा की नीतियों की अनुगामी बन गयी है। उत्तर प्रदेश की जनता खासकर किसान, मजदूर और दलित वर्ग बसपा की ओर आशा भरी निगाहों से देख रहा है। उसे उम्मीद है कि उसके शासन में उसे जो राहत थी उसे पाने के लिए फिर से बसपा का समर्थन जरुरी है। इस वर्ग के हाथ में ही सत्ता की चाबी है, जिसे चाहे सत्ता सौंपे। उधर कांग्रेस भी कोशिश कर रही है लेकिन उसका जनाधार दशकों से सत्ता से दूर रहने के कारण खिसक गया।

-जी.एस. चाहल.