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देश के किसानों को एक और झटका देने को तैयार केन्द्र सरकार

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सरकार और सरकार के गुजराती सलाहकार समझ रहे हैं कि देश में किसान दाल और अन्न उत्पादन में पिछड़ रहा है, इसलिए रुस में भूमि पट्टे पर लेकर खेती करने की योजना बन रही है.

केन्द्र सरकार देश के किसानों की स्थिति को या तो समझ नहीं रही या वह जानबूझकर ऐसी नीतियां लागू कर रही है, जिससे उनकी आर्थिक हालत बद से बदतर होती जाये। इसके विपरीत सरकार टीवी और बड़े अखबारों में प्रतिदिन लाखों रुपये इस प्रचार में खर्च कर रही है कि आजाद भारत की अबतक जितनी भी सरकारें आयीं यह सरकार उनमें सबसे बड़ी किसान हितैषी सरकार है।

किसानों को उनकी उपज का वाजिब मूल्य नहीं मिल रहा। थोड़ा अच्छी फसल किसान की हो जाये तो उसे मिट्टी के भाव भी कोई खरीदने को तैयार नहीं होता। टमाटर, प्याज और आलू की हर बार यही व्यथा है। पिछले साल प्याज 80 रुपये किलो तक बिका, महाराष्ट्र के किसानों ने मेहनत और भारी रकम खर्च कर अच्छी फसल उगायी तो उसका माल अब 80 रुपये कुन्टल भी नहीं बिक रहा, जबकि उपभोक्ताओं को यही प्याज पन्द्रह से बीस रुपये में खरीदना पड़ रहा है।

दालें आज भी डेढ़ सौ से लेकर दो सौ रुपयों तक में बिक रही हैं। यदि किसान इनका उत्पादन बढ़ा देगा तो ये ही मुश्किल से तीस से चालीस रुपये पर आ जायेंगी। किसान अन्न उत्पादन बढ़ाने में सक्षम है। वह चाहे तो दाल, सब्जियां और अनाज का उत्पादन दोगुने से भी अधिक कर सकता है। बल्कि इससे भी ऊपर जा सकता है। लेकिन वजह यही है कि उसे उत्पादन का लाभकारी मूल्य नहीं मिलता।

सरकार और सरकार के गुजराती सलाहकार समझ रहे हैं कि देश में किसान दाल और अन्न उत्पादन में पिछड़ रहा है, इसलिए रुस में भूमि पट्टे पर लेकर खेती करने की योजना बन रही है। खबर है कि मोदी सरकार के अधिकारी रुस से खेती के लिए जमीन पट्टे पर लेने की तैयारी में जुट गये हैं। बताया तो यही जा रहा है कि रुस से पुराने संबंध बनाये रखने की कड़ी में सरकार उससे कोई न कोई संबंध बनाये रखना चाहती है। इसलिए दूसरे व्यापार के बजाय यह समझौता सरकार को अधिक पसंद आ रहा है।

इससे पट्टे की कीमत और सरकारी स्तर से खेती करने का खर्च बहुत अधिक पड़ेगा। सरकार यदि अपने देश के किसानों को ही उनके उत्पादों का उचित और लाभकारी मूल्य प्रदान कर दे तो वही इतना उत्पादन कर देंगे कि आधी दुनिया का पेट भरने में सक्षम हो जायेगा। रुस में खेती करने से सरकार अपने किसानों को ही नुकसान पहुंचायेगी। इससे सरकारी खजाने पर अतिरिक्त बोझ पड़ेगा और देश के किसानों के उत्पाद और भी सस्ते हो जायेंगे।

-जी.एस. चाहल.


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