Header Ads

सपा की राह के रोड़े हटाना चाहते हैं रालोद और राकिमसं?

दोनों दलों का जोर लगाकर लड़ना सपा की किस्मत चमका सकता है. सपा का कमज़ोर उम्मीदवार भी आसानी से निकल सकता है.

विधानसभा क्षेत्रों में नौगांवा सादात सीट की जय-पराजय की जिम्मेदारी रालोद और राष्ट्रीय किसान मजदूर संगठन के नेता लेने को तैयार हैं। इनके मैदान में आने से जहां भाजपा यहां पराजित होगी, वहीं आजकल मजबूत हालत में दिखाई दे रही बसपा भी संकट में पड़ जायेगी। ऐसे में आपसी गुटबंदी में फंसी सपा की राह आसान हो जायेगी। फिर कांग्रेस या दूसरे किसी भी दल से कोई भी मैदान में आये नौगांवा सीट सपा के पाले में एक बार फिर चली जायेगी।

चुनाव में अभी कई महीने हैं तथा भाजपा और राकिमसं के अलावा अभी किसी भी दल ने अपने उम्मीदवार मैदान में नहीं उतारे। भाजपा और सपा के उम्मीदवार जबतक घोषित नहीं होंगे तबतक हार-जीत के कयास नहीं लगाये जा सकते। सभी दल जातीय मतों की जोड़गांठ के आधार पर अपने उम्मीदवार तय करते हैं। बसपा ही एकमात्र ऐसा दल है जिसने जिले की चारों सीटों पर अपने उम्मीदवार घोषित किये हैं।

सपा के पास जिले की चारों सीटें हैं लेकिन फिर भी वह अपने मौजूदा विधायकों में से कुछ की छंटनी करना चाहती है। सपा फूंक-फूंक कर कदम रख रही है। उसे हर हाल में जिताऊ उम्मीदवार चाहिए। हाल ही में चाचा-भतीजा विवाद ने ऐसा बीज बो दिया, जिसके चलते टिकट वितरण विवाद को और बढ़ायेगा। इससे उम्मीदवार घोषित होने में अनावश्यक विलम्ब भी अनिवार्य हो गया है।

सपा का उम्मीदवार यहां से कोई भी हो, यदि रालोद और राकिमसं नहीं माने और जोर लगाकर लड़े, तो इससे सपा का कमजोर उम्मीदवार भी आसानी से निकल सकता है। उसका बड़ा कारण यहां मुस्लिम मतदाता नब्बे हजार हैं, जो अभी तक एकजुट होकर सपा के साथ हैं। इनमें यहां के बीस हजार यादव जुड़कर एक लाख से ऊपर होते हैं। उधर बसपा, रालोद, भाजपा और राकिमसं में शेष वर्गों के वोट विभाजित होंगे। यह विभाजन यदि किसी एक दल के पक्ष में पचास फीसदी हो तब भी वह इस आंकड़े को पार कर सकता है।

रालोद और राकिमसं यहां जीतने के गणित में नहीं हैं। बल्कि दोनों का वोट बैंक एक ही समुदाय है। ये इस वोट बैंक को भाजपा और बसपा दोनों की ओर जाने से रोकेंगे। सपा की लड़ाई यहां बसपा और भाजपा से है। ये दोनों जितने मजबूत लड़ेंगे, भाजपा और बसपा को उतना ही घाटा होगा। जिसका लाभ सीधा सपा को मिलेगा। यदि भाजपा कैराना प्रकरण को उभारकर साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण का बीज बोने में सफल रही तो वह यहां के सबसे बड़े वोट बैंक को आकर्षित कर बाजी मार सकती है। जबकि बसपा ने यदि यहां से मुस्लिम मतदाता मैदान में उतार दिया तो वह सब पर भारी पड़ सकता है लेकिन उसे जिले की शेष तीनों सीटों पर नुकसान उठाना पड़ेगा जहां जाट तथा अन्य हिन्दू मतदाता उसे सपा और भाजपा के खिलाफ इसलिए समर्थन दे रहे हैं कि बसपा के अलावा भाजपा और सपा ने यहां किसी जाट को उम्मीदवार नहीं बनाया।

यह तो मौजूदा स्थिति के चलते है। भाजपा और सपा को उम्मीदवार उतारने दो यहां की तस्वीर साफ होनी शुरु हो जायेगी। फिलहाल तो रालोद और राकिमसं सपा की सत्ता के लिए उसका रास्ता साफ करने में लग गये हैं।

-टाइम्स न्यूज़ अमरोहा.




Gajraula Times  के ताज़ा अपडेट के लिए हमारा फेसबुक  पेज लाइक करें या ट्विटर  पर फोलो करें. आप हमें गूगल प्लस  पर ज्वाइन कर सकते हैं ...