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विजयपाल साईकिल छोड़ कमल की ओर, चौथा दलबदल है सैनी का

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यदि किसी कारण भाजपा सत्ता में नहीं आयी तो, किसी ने बांधा थोड़े ही है, जो सत्ता में आयेगा उस दल में विजयपाल सैनी चले जायेंगे. दलबदल के वे अब आदी हो चुके हैं.

सपा के पूर्व जिलाध्यक्ष विजयपाल सैनी विधानसभा चुनाव से ठीक पहले एक बार फिर पाला बदल गये। सपा में उपेक्षा से परेशान सैनी भाजपा में शामिल हो गये हैं। दो दशक के राजनैतिक जीवन में यह उनका चौथा दलबदल है। विजयपाल सैनी और उनके निकट संबंधी ऐसे कारोबार से सरसब्ज होते आये हैं, जिन्हें बिना राजनैतिक ताकत के चलाना बहुत मुश्किल बल्कि असंभव सा जान पड़ता है। राजनीति में प्रवेश करने के दौरान उन्हें तेल के काले कारोबार में कानूनी पकड़ में आना पड़ा। उस समय वे बिल्कुल निचले पायदान से राजनीति शुरु कर रहे थे।

विजयपाल राजनीति के मजबूत बिन्दु की पकड़ के लिए प्रयास करने लगे। वे प्रखर वक्ता हैं। उनका भाषण एक मंजे हुए राजनीतिज्ञ की तरह होता है। किसी भी दल में जनपद अमरोहा में कोई नेता इतना बेहतर वक्ता अभी नहीं है। वे जितने अच्छे वक्ता हैं, उतने ही, राजनीति के सहारे अवैध धंधों को अंजाम देने के भी उस्ताद हैं।

उन्होंने सपा के जिलाध्यक्ष रहते हुए अपनी पत्नि को अपनी साली के नाम से नौकरी दिला दी। अपनी भांजी के नाम अमरोहा में अवैध नर्सिंग होम खुलवा दिया। सपा जिलाध्यक्ष पद से हटते ही नर्सिंग होम पर छापा पड़ा तो वह बंद कर पीछा छुड़ाया। कई और भी मामले हैं जिन्हें सत्ता के बल पर दबाया जाता रहा है। भविष्य में उनके खुलने के भय तथा सपा में जड़ें कमजोर पड़ने से उन्हें सपा छोड़ भाजपा का पल्ला पकड़ने को मजबूर होना पड़ा है।

सैनी बसपा उम्मीदवार रहते हुए दो बार चुनाव हारे, रालोद से उम्मीदवार रहते हुए भी नहीं जीते, सपा ने उन्हें चुनाव नहीं लड़ाया लेकिन जिलाध्यक्ष बनाया। अब भाजपा में जरुर गये हैं लेकिन वहां उन्हें कोई महत्वपूर्ण पद नहीं मिलने वाला। जिले में सैनी बिरादरी की पहले ही भीड़ मौजूद है। फिर भी चालाक छवि के विजयपाल को उम्मीद है कि इस बार सूबे में भाजपा सत्ता में आयेगी। इसलिए उसके सहारे काम चलता रहेगा। यदि किसी कारण सत्ता में नहीं आयी तो, किसी ने बांधा थोड़े ही है, जो सत्ता में आयेगा उस दल में चले जायेंगे। दलबदल के वे अब आदी हो चुके हैं। अब तक तो यह फैसला उनके हक में ही रहा है। वे जिस दल में भी गये हैं, उन्हें सम्मान दिया गया है। बसपा ने दो बार उम्मीदवार बनाया, रालोद में जाते ही उम्मीदवारी मिली। सपा में पहुंचते ही जिलाध्यक्ष पद मिला। अब भाजपा में गये हैं। वहां शायद उन्हें निराशा के सिवा कुछ नहीं मिलने वाला। क्योंकि कमल तक पहुंचने का रास्ता कीचड़ से गुजरता है।

-टाइम्स न्यूज़ मंडी धनौरा.

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