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गौशाला और गायें कहां गये?

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गौशाला को बिना पशुओं के अनुदान मिलता आ रहा था?

कागजों में चल रही एक गौशाला को 29 पशु पांच थानों द्वारा सौंपे जाने का मामला प्रकाश में आया है। जिस स्थान पर गौशाला दर्ज है। वहां न तो गौशाला ही है और न ही कोई पशु। पुलिस अधीक्षक की रिपोर्ट के अनुसार अगस्त माह में ये गौवंशीय पशु थाना रजबपुर के गांव नूरपुर स्थित वृंदावन गौशाला सेवा समिति के सुपुर्द किये गये थे। इस रिपोर्ट के आधार पर जब उत्तर प्रदेश गो सेवा आयोग के सदस्य राहुल सिंह ने मौके पर जाकर देखा तो वहां केवल गन्ने का खेत है जहां एक छोटी सी दीवार भी खड़ी है।

पुलिस रिपोर्ट में पांच थानों के पशु एक ही गौशाला की सुपुर्दगी में दर्ज देखकर ही गौशाला देखने का विचार आयोग के सदस्य के दिमाग में आया होगा। जिले में कई गौशालायें हैं, इसके बावजूद एक ही गौशाला को सारे थानों द्वारा पशु सुपुर्द करना स्वतः ही सवाल खड़े करता है।

यह तो केवल अगस्त माह की ही रिपोर्ट है। आयोग को पिछली रिपोर्टों की भी तस्दीक करनी होगी। एक माह की पुलिसिया कारगुजारी से ही लखनऊ तक हलचल है तथा अब आयोग पूरे जनपद की सभी गौशालाओं की पड़ताल करेगा। बताया तो यह भी जा रहा है कि गौशालाओं को पुलिस रिपोर्ट के आधार पर अनुदान मुहैया कराया जाता है। खुद राहुल सिंह ने भी बताया है कि वे इस गौशाला का अनुदान भी बढ़ाना चाहते थे। इसका मतलब है कि इस गौशाला को बिना पशुओं के ही अनुदान मिलता आ रहा था। सुपुर्दगी में दिये पशुओं को या तो पुलिस ने बेच दिया है या गौशाला और पुलिस दोनों ने मिलकर खेल किया है। कुछ भी है, पुलिस की भूमिका घेरे में है।

एसपी को अंधरे में रखा थानेदारों ने :
रजबपुर, गजरौला, डिडौली सहित जनपद के जिन पांच थानों की पुलिस ने गौवंशीय पशुओं को वृंदावन गौशाला की सुपुर्दगी में दिखाया है, उसकी पुष्टि एसपी की उस रिपोर्ट से होती है जो गो-सेवा आयोग के सदस्य को दी गयी है। इसी से पता चलता है कि इन थानों के थानेदारों ने एसपी को भी सही जानकारी नहीं दी। मौके पर पशु और गौशाला न होने से ही इस प्रकरण के फर्जीवाड़े का प्रमाण मिल गया है। यदि जांच दिशा से नहीं भटकी तो खाकी फंदे में फंसेगी।

लेकिन इस तरह की जांच में जांचकर्ता अपना अधीनस्थों के बचाने का ही प्रयास करते हैं। विभागीय जांचों में बहुधा यही होता है। फिर भी एएसपी द्वारा जारी जांच की प्रतीक्षा करनी होगी।

इसमें गौ सेवा आयोग भी अपने स्तर से जांच करेगा। उसमें गौशाला संचालक तो सीधा दोषी पाया जायेगा। जब उसका अनुदान बढ़ाने की बात हो रही थी, तो इसी से पता चलता है कि कागजों में यह गौशाला चल रही थी और अनुदान भी ले रही थी। जबकि मौके पर गौशाला और पशुओं का नामोनिशान भी नहीं। प्रथम दृष्टया जो प्रमाण है वे तो पुलिस और गौशाला संचालक की सांठगांठ का संकेत दे रहे हैं।

कई बार लोग ऐसे आरोप लगाते रहे हैं कि एक सपा नेता ने दूसरे व्यक्ति के नाम गौशाला पंजीकृत करायी है तथा पुलिस पशु तस्करों से पकड़े गौवंशीय पशुओं को इसी गौशाला में भिजवाती है। जहां से उन्हें सपा नेता द्वारा अवैध वध शालाओं में वध के लिए भेजा जाता है। इस आरोप की भी जांच जरुरी है। लोगों द्वारा वह गौशाला भी रजबपुर थाना क्षेत्र में ही बतायी जाती थी।

-टाइम्स न्यूज़ गजरौला.


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