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सिर्फ छह माह में सौ से सवा सौ हो जाता है किसान का कर्ज़ : सहकारी समितियों पर अन्नदाता की खुली लूट

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सरकार किसानों की हिमायती बनने के ढोंग करती आ रही है लेकिन अनाज की सवाया प्रथा को समाप्त करने या कम करने की ओर कोई ध्यान नहीं दे रही.

देश के लिए अन्न पैदा करने वाले किसान के घर खाने के लिए अन्न के दाने नहीं बचे। छोटे किसान मजबूरी में उस गेहूं को भी बेच बैठे जो उन्होंने खाने के लिए रखा था। सहकारी समितियों पर खाने के गेहूं खरीदने वाले किसानों की काफी संख्या है। प्रतिदिन अनेकों किसान उधारा गेहूं ले जा रहे हैं। यह गेहूं उन्हें फसल आने पर मई में देना होगा। समितियां ऐसे किसानों से सवाया गेहूं वसूल करती हैं। एक कुंटल का सवा कुंटल। यह परंपरा तभी से चली आ रही है जब से इन समितियों का गठन किया गया था। गजरौला, बछरायूं, मंडी धनौरा, हसनपुर, अमरोहा तथा जोया की समितियों से किसान गेहूं उधार ले रहे हैं। अचानक गेहूं का भाव बढ़ने और बैंकों से भुगतान रुकने के कारण किसानों के सामने और भी समस्या हो गयी है।

सवाये पर गेहूं उधार देने का तात्पर्य है कि सौ रुपये के सवा सौ वसूलना। यह वसूली छह माह में की जाती है। यानि एक साल में डेढ़ गुना वसूली। इतना बड़ा ब्याज तो गांवों में साहूकार भी नहीं वसूल रहे। किसान की खाल उतारने का यह काम उन सहकारी समितियों का है, जो बनाई ही किसानों की हिमायत के लिए गयी हैं। भूखे किसान ने कभी भी इस लूट का हिसाब नहीं लगाया। उसे यह इसलिए आसान लगता है कि फसल तुलवाकर हिसाब हो जाता है। नकद राशि नहीं देनी पड़ती। जब यह परंपरा शुरु की गयी थी तब फसल में कीमत बहुत कम कर दी जाती थी और बाद में जब किसान अनाज खत्म कर चुका होता था तो बाजार में उसकी कीमतें दोगुना तक कर दी जाती थीं। आज ऐसा नहीं है। फिर भी किसान एक परंपरा को ढोता आ रहा है और बिना सोचे समझे लुट रहा है।

सरकार किसानों की हिमायती बनने के ढोंग करती आ रही है लेकिन अनाज की सवाया प्रथा को समाप्त करने या कम करने की ओर कोई ध्यान नहीं दे रही। जबकि बीते तीन दशक में हर तरह के बैंक लोन काफी कम होते गये हैं। किसान खुद भी इस विषय पर मौन हैं। उसे अपने शोषण के खिलाफ स्वयं पहल करनी होगी। नहीं तो लुटता रहेगा किसान।

-टाइम्स न्यूज़ ब्यूरो.


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