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मौत की सवारी बनी भारतीय रेल

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कभी हाईस्पीड ट्रेन का ट्रायल और कभी बुलेट ट्रेन चलाने के ढोल पीटने वालों को यह भी पता नहीं कि उनके रेलवे ट्रैक कितने क्षमतावान हैं.

ढाई साल पूर्व केन्द्र में आयी एनडीए सरकार के प्रधानमंत्री, उनके सहयोगी और भगवा टोली सबसे अधिक बयानबाजी रेलवे में बदलाव को लेकर करती रही है। बुलेट ट्रेन को लेकर जितने ढोल बजाये गये हैं उतने शायद ही किसी चीज़ को लेकर चर्चा हुई है। एक बार न्यूज़ चैनल महीनों तक बुलेट ट्रेन को लेकर ही कवरेज़ में जुटे थे। यहां शोर मचाया गया कि चीन और जापान से मोदी जी बुलेट ट्रेन लेकर आयेंगे। जैसे कि वह कोई खिलौना हो। बाद में स्थिति यह हो गयी कि यहां चलने वाली साधारण ट्रेनें भी सही तरह नहीं चल पायीं। मई में आयी सरकार ने जून में 14 फीसदी किराया यह कहकर बढ़ा दिया कि रेलवे को सुविधाजनक बनाने के लिए यह जरुरी है।

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इसी साल मई माह में गढ़मुक्तेश्वर के पास ट्रैक से गाड़ी पटरी से उतर गयी थी.

इसके बाद भी रेलवे को घाटे में दिखाया गया और हालत यह कर दी गयी कि अनेकों पैसेंजर ट्रेनें बंद कर दीं, कहा गया कि इनसे घाटा हो रहा है। जिस महकमे में दस साल तक बिना किराया बढ़ाये रेलें बिना घाटे के चल रही थीं, हर बजट के बाद नई गाड़ियों और डिब्बों की संख्या बढ़ाई जाती रही। स्टेशनों की संख्या और ट्रेनों की रफ्तार में वृद्धि होती रही, जम्मू-कश्मीर में अंतर्राष्ट्रीय स्तर का रेलवे स्टेशन बनाया गया हो। अधिकांश लाइनों पर विद्युतीकरण भी किया गया हो, उस महकमे में किराया बढ़ने के साथ ही न तो कोई ढांचागत सुधार हुआ और न ही नयी गाड़ियां चलाई गयीं बल्कि रेलवे बड़े घाटे का सौदा बन गया।

कानपुर दुघर्टना इस बात का सबूत है कि यह विभाग घोर लापरवाही और भ्रष्टाचार का केन्द्र बन गया है। इसमें सुधार करने के बजाय केन्द्र सरकार उसके अलग बजट को आम बजट में इस बार शामिल करने का फैसला कर चुकी। यह गुठिलयों में छिलके मिलाने वाली देहाती कहावत की पुष्टि करने के अलावा कुछ नहीं। रेलमंत्री बनने के लिए शिवसेना से दलबदल कर भाजपा में आये सुरेश प्रभु से और क्या उम्मीद की जा सकती है?

कभी हाईस्पीड ट्रेन का ट्रायल और कभी बुलेट ट्रेन चलाने के ढोल पीटने वालों को यह भी पता नहीं कि उनके रेलवे ट्रैक कितने क्षमतावान हैं। ट्रैक चटखने के मामले आम बात हैं। रेलवे जर्जर है। जिसके बुनियादी ढांचे में आमूलचूल बदलाव की जरुरत है। जबकि आर्थिक संकटग्रस्त इस महकमे में यह काम मौजूदा सरकार की ताकत से बाहर की बात है। जो सरकार पैसेंजर ट्रेन चलाने से हाथ खड़े कर रही है, वह बुलेट ट्रेन भला कैसे चला पायेगी? वास्तव में भारतीय रेल मौत की सवारी बन गयी है।

-जी.एस. चाहल.


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