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भ्रष्टाचार के खिलाफ यह कैसी लड़ाई?

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या तो वाड्रा, अखिलेश, माया पर आरोप ही झूठे थे अथवा मोदी बड़े लोगों पर हाथ डालने से डर रहे.


पांच राज्यों में होने जा रहे चुनावों से पहले हमारे देश के नेताओं में अपनी प्रशंसा और दूसरों के भ्रष्टाचार पर आक्रमण की जंग छिड़ गयी है। लोकसभा चुनावों से पूर्व भाजपा नेताओं के मुख्य निशाने पर सोनिया गांधी, उनका दामाद राबर्ट वाड्रा और दिल्ली की तत्कालीन मुख्यमंत्री शीला दीक्षित तो थे ही, सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव तथा बसपा सुप्रीमो मायावती भी उनके निशाने पर थे।

सरकार बनने से पहले मायावती और मुलायम सिंह भी एक दूसरे के निशाने पर रहते हैं।

मजेदार बात है कि कुर्सी मिलने के बाद इनमें से किसी भी नेता ने किसी के भी खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की। सारे मामले ठंडे बस्ते में चले जाते हैं।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का सबसे अधिक जोर सोनिया गांधी और राबर्ट वाड्रा के कथित भ्रष्टाचार के आरोपों पर रहा है। वे इनके साथ ही सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह को भी चुनावों से पहले भ्रष्टाचार और घोटालों के आरोपी बनाकर जेल भेजने की बात करते थे। 


उन्हें प्रधानमंत्री बने ढाई साल से अधिक हो गये लेकिन चुनाव से पूर्व राबर्ट वाड्रा पर भूमि घोटालों का आरोप लगाने वाले मोदी जी ने अभी तक उनके खिलाफ कोई भी कार्रवाई नहीं की, जेल भेजने की तो बात दूर की कौड़ी हो गयी है।

इसका मतलब तो यही हुआ कि या तो आरोप ही झूठे थे अथवा वे बड़े लोगों पर हाथ डालने से डर रहे हैं।

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मायावती और अखिलेश यादव के शासन में भ्रष्टाचार के पर्याय बने यादव सिंह जैसे अधिकारी को संरक्षण देने के सबूत मिलने के बावजूद इन दोनों नेताओं के खिलाफ भी मोदी जी ने कुछ नहीं कराया।

मुलायम सिंह यादव जैसे लोगों की आय से अधिक संपत्ति के मामले भी दबा दिये गये। शीला दीक्षित प्रकरण को जब दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल ने उखाड़ा तो उसमें भी अडंगा केन्द्र सरकार की ओर से ही लगाया गया।

प्रधानमंत्री भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई का दावा कर रहे हैं तथा भ्रष्ट नेताओं के खिलाफ मौन हैं। भ्रष्टाचार से यह कैसी लड़ाई?

-जी.एस. चाहल.


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